रीती गागर का क्या होगा-गीत-अगीत-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj 

रीती गागर का क्या होगा-गीत-अगीत-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

माखन चोरी कर तूने कम तो कर दिया बोझ ग्वालिन का
लेकिन मेरे श्याम बता अब रीती गागर का क्या होगा ?

युग-युग चली उमर की मथनी
तब झलकी दधि में चिकनाई,
पिरा-पिरा हर सांस उठी जब
तब जाकर मटकी भर पाई,

एक कंकड़ी तेरे कर की
किन्तु न जाने आ किस दिशि से
पलक मारते लूट ले गई
जनम-जनम की सकल कमाई,
पर है कुछ न शिकायत तुझ से, केवल इतना ही बतला दे,
मोती सब चुग गया हंस तब मानसरोवर का क्या होगा?
माखन चोरी कर तूने…

सजने को तो सज जाती है
मिट्टी यह हर एक रतन से,
शोभा होती किन्तु और ही
मटकी की टटके माखन से,
इस द्वारे से उस द्वारे तक
इस पनघट से उस पनघट तक
रीता घट है बोझ धरा पर
निर्मित हो चाहे कंचन से,
फिर भी कुछ न मुझें दु:ख अपना चिन्ता यदि कुछ है तो यह है
वंशी धुनी बताएगा जो उस वंशीधर का क्या होगा?
माखन चोरी कर तूने…

दुनिया रस की हाट, सभी को
खोज यहाँ रस की क्षण-क्षण है,
रस का ही तो भोग जनम है,
रस का ही तो त्याग मरण है,

और सकल धन धूल, सत्य
तो धन है बस नवनीत हृदय का,
वही नहीं यदि पास, बड़े से
बड़ा धनी फिर तो निर्धन है,
अब न नचेगी यह गूजरिया, ले जा अपनी कुर्ती फरिया,
रितु ही जब रसहीन हुई तो पचरंग चूनर का क्या होगा?
माखन चोरी कर तूने…

देख समय हो गया पैंठ का
पथ पर निकल पड़ी हर मटकी
केवल मैं ही निज देहरी पर
सहमी-सकुची, अटकी-भटकी,

पास नहीं गो-रस कुछ भी
कैसे तेरे गोकुल आऊं?
कैसे इतनी ग्वालिनियों में
लाज बचाऊं अपने घट की,
या तो इसको फिर से भर दे, या इसके सौ टुकड़े कर दे
निर्गुण जब हो गया सगुन, तब इस आडम्बर का क्या होगा ?
माखन चोरी कर तूने…

जब तक थी भरपूर मटकिया,
सौ-सौ चोर खड़े थे द्वारे,
अनगिन चिंताएँ थीं मन में
गेह जड़े थे लाख किवाड़े,

किन्तु कट गई अब हर साँकल
और हो गई हल हर मुश्किल
अब परवाह नहीं इतनी भी
नाव लगे किस नदी-किनारे,
सुख-दुख हुए समान सभी पर फिर भी एक प्रश्न बाक़ी है
वीतराग हो गया मनुज तो, बूढ़े ईश्वर का क्या होगा?
माखन चोरी कर तूने…

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