रिशत्यां दा खून हुण्दा मैं जदों वी वेखदां-गज़लें-कर्मजीत सिंह गठवाला -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Karamjit Singh Gathwala

रिशत्यां दा खून हुण्दा मैं जदों वी वेखदां-गज़लें-कर्मजीत सिंह गठवाला -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Karamjit Singh Gathwala

रिशत्यां दा खून हुण्दा मैं जदों वी वेखदां ।
हंझूआं दी अग्ग ‘ते फिर हत्थ आपणे सेकदां ।

वड्ड्यां दी गल्ल उप्पर खड़ना है औखा बड़ा ;
सभ नूं उह दस्सदा फिरे, ‘मैं सुबह मत्था टेकदां’ ।

कद्द उसदा होर भावें नींवा हुण्दा जा रेहा ;
रोज आखे, ‘एस नूं मैं तारिआं संग मेचदां’ ।

जंम्यां इनसान उह इनसान पर बण्यां नहीं ;
ताहीउं सभ तों पुच्छदा, ‘दस्सो मैं केहड़े भेखदां’ ?

‘घड़ी घड़ी क्युं रंग बदलें’?पुच्छन ते उस दस्स्या ;
‘सोच मेरी आपणी मैं जिदां मरज़ी वेचदां’ ।

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