राहु-धूप और धुआँ -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar 

राहु-धूप और धुआँ -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

चेतनाहीन ये फूल तड़पना क्या जानें ?
जब भी आ जाती हवा की पग बढाते हैं ।
झूलते रात भर मंद पवन के झूलों पर,
फूटी न किरण की धार कि चट खिल जाते हैं ।

लेकिन, मनुष्य का हाल ? हाय, वह फूल नहीं,
दिनमान निठुर सारा दिन उसे जलाता है ।
औ’ फुटपाथों पर लेट रातभर पड़ा-पड़ा
आदमी चाँद को अपना घाव दिखाता है ।

जिसका सारा जादू समाप्त हो फूलों पर,
वह सूर्य जगत में किस बूते पर जीता है ?
मरता न डूब क्यों चाँद, हृदय का मधु जिसका
मानव की आत्मा नहीं, दग्ध तन पीता है ?

यह जलन ? और यह दाह ? सूर्य अम्बर छोड़े;
यह पीला-पीला चाँद ? इसे बुझ जाने दो ।
क्या अन्धकार इससे भी दुखदायी होगा ?
मत रोको कोई राह, राहु को आने दो ।

(1949)

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