राष्ट्रगान मुझको भी आता है- कविता -मनोहर लाल ‘रत्नम’ सहदेव-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Manohar Lal Ratnam Sahdev 

राष्ट्रगान मुझको भी आता है- कविता -मनोहर लाल ‘रत्नम’ सहदेव-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Manohar Lal Ratnam Sahdev

जन गण मन बीमार पड़ा है, अधिनायक है कहाँ सो गया,
भारत भाग्य विधाता भी तो, इन गलियों में कहीं खो गया।
मेरे भारत के मस्तक पर, है आतंक की काली छाया –

कर्णधार जितने भारत के,
इन सबको है संसद भाता।
मुझसे यदि पूछ कर देखो,
राष्ट्रगान मुझको है आता॥

आग लगी है पंजाब मेरे में, सिंधु और गुजरात जल गया,
मौन मराठा, द्राविड़, उत्कल और बंग को द्वैष छल गया।
विंध्य, हिमाचल को डर लगता, यमुना-गंगा के पानी से –

उच्छल जलधि तरंग कहाँ अब,
केवल लहू बहाया जाता।
मुझसे यदि पूछ कर देखो,
राष्ट्रगान मुझको है आता॥

तव शुभ नामे जागे वाला, महामंत्र फिर से गाना है,
तव शुभ आशिष मागे किससे, उस मूरत को ढुँढवाना है।
गाहे तव जय गाथा जन जन, फिर ऐसा आधार बनालें –

जन गण मंगल दायक जय हे,
अपना भारत भाग्य विधाता।
मुझसे यदि पूछ कर देखो,
राष्ट्रगान मुझको है आता॥

जय हे, जय हे, जय हे, कहना, यह कोई संघर्ष नहीं है,
केवल जय का नाद लगाना, यह कोई उत्कर्ष नहीं है।
जन गण मन गाने से पहले, जन-जन का विश्वास जगा लें –

राष्ट्र बचाएं अपना ‘रत्नम’,
भारत भू से अपना नाता।
मुझसे यदि पूछ कर देखो,
राष्ट्रगान मुझको है आता॥

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