रामकली- गुरू गोबिन्द सिंह जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Gobind Singh Ji 

रामकली- गुरू गोबिन्द सिंह जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Gobind Singh Ji

रे मन ऐसो करि संनिआसा ॥
बन से सदन सभै करि समझहु मन ही माहि उदासा ॥१॥ रहाउ ॥
जत की जटा जोग को म्जनु नेम के नखन बढाओ ॥
गयान गुरू आतम उपदेशहु नाम बिभूत लगाओ ॥१॥
अलप अहार सुलाप सी निंद्रा दया छिमा तन प्रीति ॥
सील संतोख सदा निरबाहिबो ह्वैबो त्रिगुण अतीति ॥२॥
काम क्रोध हंकार लोभ हठ मोह न मन सो लयावै ॥
तब ही आतम तत को दरसे परम पुरख कह पावै ॥३॥१॥

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