रात पश्मीने की-गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar 4

रात पश्मीने की-गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar 4

बीमार याद

इक याद बड़ी बीमार थी कल,
कल सारी रात उसके माथे पर,
बर्फ़ से ठंडे चाँद की पट्टी रख रखकर-
इक इक बूँद दिलासा देकर,
अज़हद कोशिश की उसको ज़िन्दा रखने की !
पौ फटने से पहले लेकिन…
आख़िरी हिचकी लेकर वह ख़ामोश हुई !!

चाँद समन

रोज आता है ये बहरूपिया,
इक रूप बदलकर,
और लुभा लेता है मासूम से लोगों को अदा से !
पूरा हरजाई है, गलियों से गुजरता है,
कभी छत से, बजाता हुआ सिटी—
रोज आता है, जगाता है, बहुत लोगो को शब् भर !
आज की रात उफक से कोई,
चाँद निकले तो गिरफ्तार ही कर लो !!

सोना

ज़रा आवाज़ का लहजा तो बदलो………
ज़रा मद्धिम करो इस आंच को ‘सोना’
कि जल जाते हैं कंगुरे नर्म रिश्तों के !
ज़रा अलफ़ाज़ के नाख़ुन तराशो ,
बहुत चुभते हैं जब नाराज़गी से बात करती हो !!

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