राजा विनय-बोधिसत्व -खण्डकाव्य-करन कोविंद -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Karan Kovind

राजा विनय-बोधिसत्व -खण्डकाव्य-करन कोविंद -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Karan Kovind

विनय प्रथ्य मैं करता
तुमसे मिलने का मन करता
पुत्र तुम्हरी छाया व्याकुल
पुत्र तुम्हारी माया आतुर
रह देखते हैं प्रतिपल मन
आ सरसित कर निज तन
तन हो चला बूढ़ा शिथिल
लौट कपिलवस्तु मिथिल
राह तकती है यशोधरा
राह ताकती कपिल धरा
एक बार सहसा आओ
राहुल कुछ कहना चाहता
विनय प्रथ्य वह करता
तुमसे मिलने का मन करता

यशोधरा है बहुत उदास
करती याद सदा सुहास
कहने का उसमें न साहस
कैसा दिया पीड़ा आसहस
चुपके छोड़ चले गये सुयश
लौट एक बार फिर आओ
कुछ दायां राहुल पर खाओ
पल पल तुम्हे पुकारता
विनय प्रथ्य मै करता
तुमसे मिलने का मन करता
प्रजा ढुढती तुमको संत
राज्य का सून पड़ा पंथ
एक क्षण को वसंत लाओ
एक बार लौट के आओ
शखा सम्बन्धि चिन्तित
सुन लो विरह विनती
जब तुम हंसते मुस्कराते
धरा से कलियां खिल जाते
सखा तुम्हार ढूंढा करता
विनय प्रथ्य वह करता
तुझसे मिलने का मन करता

रात चांदनी चंदन झलक
सिहर पड़ते उनके पलक
राहुल शत शत यही कहते
पिता क्या यह पीड़ा सहते
जिस पर हम बर्षो से करहते
एक बार लौटकर आओ
पंथ की बाधा न दिखलाओ
तुम सुयश प्रीत दर्शावो
यही आकाश तल कहता
विनय प्रथ्य मै करता
तुमसे मिलने का मन करता

जब नहीं आते पुत्र तुम तो
भेज समंत दिया समर्थक
पर समाचार न आया प्रर्थक
समंत खो गया योग भोग में
फिर विटप से भेजा सखा को
जाकर जाते सभी उस ओर
आते आने का नही है छोर
ऐसा है तो यह कैसी बाधा
तुमने कैसा बाण साधा
जब लौट नहीं आते अनुचर
दुविधा मन कि बढ़ती सत्वर
सभी शरण में तुम्हारे गये
सभी बुद्धयोग में लिपट गये
ऐसा कैसे कर सकता हे संत
लौट नहीं क्या सकता हे संत
सखा ने नित विशेष ध्येय रखा

हे संत—
मैं सखा समंत तुम्हारा
लेकर आया हू लौटने का संदेश
देखते राह तरु तल डाल प्रदेश
अब चलो हे प्रभु हे संत
कर दो व्याकुल मन अमंत
अब चलो बढ़े हे सखा सम्बन्ध
कर दो बेडापार अबन्ध
फिर दिया संदेश आने का
बादल रोष कुछ छाने का
लौटे बोधिसत्व कपिलवस्तु
फैल गयी आग सी शब्दांशु
प्रजा में भर हास- हुलास
राजा मुख पर पर्याय सुवास
परशन्नचित है प्रत्येक प्राणी
आने को है ईश्वर बुध्द ग्यिनी
उपदेश दे रहे करते प्रसार
सारे दैनिक क्रिया का विस्तार
चलो चलो संत प्रभु आते
राजा मुख खिले मुस्काते
तनिक खुश न यशोधरा
ईश्वर का न किया सर्वांगीण
वह पल लगता भंगुर क्षीण
अथक प्रयास बाहर आती
पाकर दर्शन रोती जाती
हे सुयश सोचो पुत्र का हाल
रहता था बिन पिता बिहाल
सदा कहानी कहती उससे
एक बुद्ध है इस संसार
जिसने शान्ति की विहार
त्याग दिया सुख सुविधा समृद्ध
प्रप्तकर लौटेगा बोधि सिद्ध
अब आप लौटककर आये हे
राहुल दान संग स्वीकारे हे
इसका सर्वत्र कल्याण करें हे
राहुल दान स्वीकार करें हे
राजकुमार ललायित भ्रमण इच्छा
राजा ने सहमति दी उर-अनिच्छा
जाके दूत ने राजा से यह बात कही
देखना प्राणी नित्यावन दृश्य बाहरी
तीर घाट उनिंदी चिर और यौवन
देखना है उर्मिल तार तराल पावन
जाके दूत राजा से यह बात कही
मन उच्छास एक वेदना उपाहरी
मुझे देखना सदृश्य स्वानक लोक
देखना उदयगिरी पर उदय आलोक
देखना प्रधुम्न गन्धवाह शहरी
मोहक सुगन्ध संक्षिप्त झांझरी
जहां ठहरती मलयज कि मंजर
जहां सुहारती सुफलम मनअंतर
गिरती प्रभा की संतरंग प्रताप
दिनकर कि गिरती पुंज अनुताप
अरुणिमा से लोहित स्मृति संचार
कोलाहल में द्रुत -घनघोर अभिसार
शतदल से निरुपम अरुण्य कंचार
दोपहर कि कडकित गर्मप्रतीहार
संसार कि दैनिक निति विधान
समझने को आतुर देश संविधान
भव कृत कुल प्रसारी प्रर्थवउर्जा
प्रकृती कि कुछ मिले सर्व अनुर्जा
झरनों से झरती छन छन गरल
नीर पर चमकती चंचल चपल
धार पर परिष्कृत रूप अपलक
रंगधार पर भंगदूत दादुर कनल
लहरों का शोषित पंथ ही है वो
बहती‌ केवल एक मात्र पंथ है वो
उसकी दलानो के कोने में हरी घास
चूनो से सेजित दरारें धूल कला
उच्छावित लहर की लहरी
दिग्पात शहर निरह बिठौली
कण का सम्भांर भोग कर सकूं
बंजर में भी दुर्वादल सजा सकूं
जहा में था वो हर सुख समान
महल में खाली थे बिछे वीतान
चाहता देखना खुला आकाश
चखना चाहु बेल बेर अनानास
पिता सारा प्रबंध कर दिया
मिट्टि के घर द्वार रंगवाया
सारथी को तैयार करवा कर
चले भ्रमण को सिध्दार्थ बैठक

Leave a Reply