राजा-रत्न-सेन-वैकुंठवास-खंड-पद्मावत -मलिक मुहम्मद जायसी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Malik Muhammad Jayasi

राजा-रत्न-सेन-वैकुंठवास-खंड-पद्मावत -मलिक मुहम्मद जायसी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Malik Muhammad Jayasi

तौ लही साँस पेट महँ अही । जौ लहि दसा जीउ कै रही ॥
काल आइ देखराई साँटी । उठी जिउ चला छोड़िं कै माटी ॥
काकर लोग, कुटुँब, घर बारू । काकर अरथ दरब संसारू ॥
ओही घरी सब भएउ परावा । आपन सोइ जो परसा, खावा ॥
अहे जे हितू साथ के नेगी । सबै लाग काढै तेहि बेगी ॥
हाथ झारि जस चलै जुवारी । तजा राज, होइ चला भिखारी ॥
जब हुत जीउ, रतन सब कहा । भा बिनु जीउ, न कौडी लहा ॥

गढ़ सौंपा बादल कहँ गए टिकठि बसि देव ।
छोड़ी राम अजोध्या, जो भावै सो लेव ॥1॥

 

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