राजा-गढ़-छेंका-खंड-पद्मावत -मलिक मुहम्मद जायसी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Malik Muhammad Jayasi

राजा-गढ़-छेंका-खंड-पद्मावत -मलिक मुहम्मद जायसी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Malik Muhammad Jayasi

सिधि-गुटिका राजै जब पावा । पुनि भइ सिद्धि गनेस मनावा ॥
जब संकर सिधि दीन्ह गुटेका । परी हुल, जोगिन्ह गढ़ छेंका ॥
सबैं पदमिनी देखहिं चढ़ी । सिंघल छेंकि उठा होइ मढ़ी ॥
जस घर भरे चोर मत कीन्हा । तेहि बिधि सेंधि चाह गढ़ दीन्हा ॥
गुपुत चोर जो रहै सो साँचा । परगट होइ जीउ नहिं बाँचा ॥
पोरि पौरि गढ़ लाग केवारा । औ राजा सौं भई पुकारा ॥
जोगी आइ छेंकि गढ़ मेला । न जनों कौन देस तें खेला ॥

भयउ रजायसु देखौ, को भिखारि अस ढीठ ।
बेगि बरज तेहि आवहु जन दुइ पठैं बसीठ ॥1॥

 

उतरि बसीठन्ह आइ जोहारे ।”की तुम जोगी, की बनिजारे ॥
भएउ रजायसु आगे खेलहिं । गढ़ तर छाँड़ि अनत होइ मेलहिं ॥
अस लागेहु केहि के सिख दीन्हे । आएहु मरे हाथ जिउ लीन्हे ॥
इहाँ इंद्र अस राजा तपा । जबहिं रिसाई सूर डरि छपा ॥
हौ बनिजार तौ बनिज बेसाहौ । भरि बैपार लेहु जो चाहौ ॥
हौ जोगी तौ जुगुति सौं माँगौं । भुगुति लेहु, लै मारग लागौ ॥
इहाँ देवता अस गए हारी । तुम्ह पतिंग को अहौ भिखारी ॥

तुम्ह जोगी बैरागी, कहत न मानहु कोहु ।
लेहु माँगि किछु भिच्छा, खेलि अनत कहुँ होहु” ॥2॥

 

” आनु जो भीखि हौं आएउँ लेई । कस न लेउँ जौं राजा देई ॥
पदमावति राजा कै बारी । हौं जोगी ओहि लागि भिखारी ॥
खप्पर लेइ बार भा माँगौं । भुगुति देइ देइ मारग लागौं ॥
सोई भुगुति-परापति भूजा । कहाँ जाउँ अस बार न दूजा ॥
अब धर इहाँ जीउ ओहि ठाउँ । भसम होउँ बरु तजौं न नाऊँ ॥
जस बिनु प्रान पिंड है छँछा । धरम लाइ कहिहौं जो पूछा ॥
तुम्ह बसीठ राजा के ओरा । साखी होहु एहि भीख निहोरा ॥

जोगी बार आव सो जेहि भिच्छा कै आस ।
जो निरास दिढ़ आसन कित गौने केहु पास “?॥3॥

 

सुनि बसीठ मन उपनी रीसा । जौ पीसत घुन जाइहि पीसा ॥
जोगी अस कहुँ कहै न कोई । सो कहु बात जोग जो होई ॥
वह बड़ राज इंद्र कर पाटा । धरती परा सरग को चाटा?॥
जौं यह बात जाइ तहँ चली । छूटहिं अबहिं हस्ति सिंघली ॥
औं जौं छुटहि बज्र कर गोटा । बिसरिहि भुगुति, होइ सब रोटा ॥
जहँ केहु दिस्टि न जाइ पसारी । तहाँ पसारसि हाथ भिखारी ॥
आगे देखि पाँव धरु, नाथा । तहाँ न हेरु टूट जहँ माथा ॥

वह रानी तेहि जौग है जाहि राज औ पाटु ।
सुंदर जाइहि राजघर, जोगहि बाँदर काटु ॥4॥

 

जौं जोगी सत बाँदर काटा । एकै जोग, न दूसरि बाटा ॥
और साधना आवै साधे । जोग-साधना आपुहि दाधे ॥
सरि पहुँचाव जोगि कर साथू । दिस्टि चाहि अगमन होइ हाथू ॥
तुम्हरे जोर सिंघल के हाथी । हमरे हस्ति गुरू हैं साथी ॥
अस्ति नास्ति ओहि करत न बारा । परबत करै पाँव कै छारा ॥
जोर गिरे गढ़ जावत भए । जे गढ़ गरब करहिं ते नए ॥
अंत क चलना कोइ न चीन्हा । जो आवा सो आपन कीन्हा ॥

जोगिहि कोह न चाहिय, तस न मोहिं रिस लागि ।
जोग तंत ज्यौं पानी, काह करै तेहि आगि?॥5॥

 

बसिठन्ह जाइ कही अस बाता । राजा सुनत कोह भा राता ॥
ठावहिं ठाँव कुँवर सब माखे । केइ अब लीन्ह जोग, केइ राखे?॥
अबहिं बेगहि करौ सँजोऊ । तस मारहु हत्या नहिं होऊ ॥
मंत्रिन्ह कहा रहौ मन बूझे । पति न होइ जोगिन्ह सौं जूझे ॥
ओहि मारे तौ काह भिखारी । लाज होइ जौं माना हारी ॥
ना भल मुए, न मारे मोखू । दुवौ बात लागै सम दोखू ॥
रहे देहु जौं गढ़ तर मेले । जोगी कित आछैं बिनु खेले?॥

आछे देहु जो गढ़ तरे, जनि चालहु यह बात ।
तहँ जो पाहन भख करहिं अस केहिके मुख दाँत ॥6॥

 

गए बसीठ पुनि बहुरि न आए । राजै कहा बहुत दिन लाए ॥
न जनों सरग बात दहुँ काहा । काहु न आइ कही फिरि चाहा ॥
पंख न काया, पौन न पाया । केहि बिधि मिलौ होइ कै छाया?॥
सँवरि रकत नैनहिं भरि चूआ । रोइ हँकारेसि माझी सूआ ॥
परी जो आसु रकत कै टूटी । रेंगि चलीं जस बीर-बहूटी ॥
ओहि रकत लिखि दीन्ही पाती । सुआ जो लीन्ह चोंच भइ राती ॥
बाँधी कंठ परा जरि काँठा । बिरह क जरा जाइ कित नाठा?॥

मसि नैना, लिखनी बरुनि, रोइ रोइ लिखा अकत्थ ।
आखर दहै, न कोइ छुवै, दीन्ह परेवा हत्थ ॥7॥

 

औ मुख बचन जो कहा परेवा । पहिले मोरि बहुत कहि सेवा ॥
पुनि रे सँवार कहेसि अस दूजी । जो बलि दीन्ह देवतन्ह पूजी ॥
सो अबहिं तुम्ह सेव न लागा । बलि जिउ रहा, न तन सो जागा ॥
भलेहि ईस हू तुम्ह सेव न लागा । बलि जिउ रहा, न तनि सो जागा ॥
जौ तुम्ह मया कीन्ह पगु धारा । दिस्टि देखाइ बान-बिष मारा ॥
जो जाकर अस आसामुखी । दुख महँ ऐस न मारै दुखी ॥
नैन-भिखारि न मानहिं सीखा । आगमन दौरि देहिं पै भीखा ॥

नैनहिं नैन जो बेधि गए, नहिं निकसैं वे बान ।
हिये जो आखर तुम्ह लिखे ते सुठि लीन्ह परान ॥8॥

 

ते बिष-बान लिखौं कहँ ताईं । रकत जो चुआ भीजि दुनियाईं ॥
जान जो गारै रकत-पसेऊ । सुखी न जान दुखी कर भेऊ ॥
जेहि न पीर तेहिं काकरि चिंता । पीतम निठुर होइँ अस निंता ॥
कासौं कहौं बिरह कै भाषा?। जासौ कहौं होइ जरि राखा ॥
बिरह=आगि तन बन बन जरे । नैन-नीर सब सायर भरे ॥
पाती लिखी सँवरि तुम्ह नावाँ । रकत लिखे आखर भए सावाँ ॥
आखर जरहिं न काहू छूआ । तब दुख देखि चला लेइ सूआ ॥

अब सुठि मरौं; छूछि गइ (पाती) पेम-पियारे हाथ ।
भेंट होत दुख रोइ सुनावत जीउ जात जौं साथ ॥9॥

 

कंचन=तार बाँधि गिउ पाती । लेई गा सुआ जहाँ धनि राती ॥
जैसे कँवल सूर के आसा । नीर कंठ लहि मरत पियासा ।
बिसरा भौग सेज सुख-बासा । जहाँ भौंर सब तहाँ हुलासा ॥
तौ लगि धीर सुना नहिं पीऊ । सुना त घरी रहै नहिं जीऊ ।
तौ लगि सुख हिय पेम न जाना । जहाँ पेम कत सुख बिसरामा?॥
अगर चंदन सुठि दहै सरीरू । औ भा अगिनि कया कर चीरू ॥
कथा-कहानी सुनि जिउ जरा । जानहुँ घीउ बसंदर परा ॥

बिरह न आपु सँभारै, मैल चीर, सिर रूख ।
पिउ पिउ करत राति दिन जस पपिहा मुख सूख ॥10॥

 

ततखन गा हीरामन आई । मरत पियास छाँह जनु पाई ॥
भल तुम्ह सुआ! कीन्ह है फेरा । कहहु कुसल अब पीतम केरा ॥
बाट न जानौं,अगम पहारा । हिरदय मिला न होइ निनारा ॥
मरम पानि कर जान पियासा । जो जल महँ ता कहँ का आसा?॥
का रानी यह पूछहु बाता । जिन कोइ होइ पेम कर राता ॥
तुम्हरे दरसन लागि बियोगी । अहा सो महादेव मठ जोगी ॥
तुम्ह बसंत लेइ तहाँ सिधाई । देव पूजि पुनि ओहि पहँ आई ॥

दिस्टि बान तस मारेहु घायल भा तेहि ठाँव ।
दूसरि बात न बोलै, लेइ पदमावति नाँव ॥11॥

रोवँ रोवँ वै बान जो फूटे । सूतहि सूत रुहिर मुख छूटे ॥
नैनहिं चली रकत कै धारा । कंथा भीजि भएउ रतनारा ॥
सूरुज बूड़ि उठा होई ताता । औ मजीठ टेसू बन राता ॥
भा बसंत रातीं बनसपती । औ राते सब जोगी जती ॥
पुहुमि जो भीजि, भएउ सब गेरू । औ राते तहँ पंखि पखेरू ॥
राती सती अगिनि सब काया । गगन मेघ राते तेहि छाया ॥
ईंगुर भा पहार जौं भीजा । पै तुम्हार नहिं रोवँ पसीजा ॥
तहाँ चकोर कोकिला, तिन्ह हिय मया पईठि ।
नैन रकत भरि आए,तिन्ह फिरि कीन्ह न दीठ ॥12॥

 

ऐस बसंत तुमहिं पै खेलहु । रकत पराए सेंदुर मेलेहु ॥
तुम्ह तौ खेलि मँदिर महँ आईं । ओहि क मरम पै जान गोसाईं ॥
कहेसि जरै को बारहि बारा । एकहि बार होहुँ जरि छारा ॥
सर रचि चहा आगि जो लाई । महादेव गौरी सुधि पाई ॥
आइ बुझाइ दीन्ह पथ तहाँ । मरन-खेल कर आगम जहाँ ॥
उलटा पंथ पेम के बारा । चढ़ै सरग, जौ परै पतारा ॥
अब धँसि लीन्ह चहै तेहि आसा । पावै साँस, कि मरै निरासा ॥

पाती लिखि सो पठाई, इहै सबै दुख रोइ ।
दहुँ जिउ रहै कि निसरै, काह रजायसु होइ?॥13॥

 

कहि कै सुआ जो छोड़ेसि पाती । जानहु दीप छुवत तस ताती ॥
गीउ जो बाँधा कंचन-तागा । राता साँव कंठ जरि लागा ॥
अगिनि साँस सँग निसरै ताती । तरुवर जरहिं ताहि कै पाती ॥
रोइ रोइ सुआ कहै सो बाता । रकत कै आँसु भएउ मुख राता ॥
देख कंठ जरि लाग सो गेरा । सो कस जरै बिरह अस घेरा ॥
जरि जरि हाड़ भयउ सब चूना । तहाँ मासु का रकत बिहूना ॥
वह तोहि लागि कथा सब जारी । तपत मीन, जल देहि पवारी ॥

तोहि कारन वह जोगी, भसम कीन्ह तन दाह ।
तू असि निठुर निछोही, बात न पूछै ताहि ॥14॥

 

कहेसि”सुआ! मोसौं सुनु बाता । चहौं तो आज मिलौं जस राता ॥
पै सो मरम न जाना भोरा । जानै प्रीति जो मरि कै जोरा ॥
हौं जानति हौं अबही काँचा । ना वह प्रीति रंग थिर राँचा ॥
ना वह भएउ मलयगिरि बासा । ना वह रवि होइ चढ़ा अकासा ॥
ना वह भयउ भौंर कर रंगू । ना वह दीपक भएउ पतंगू ॥
ना वह करा भृंग कै होई । ना वह आपु मरा जिउ खौई ॥
ना वह प्रेम औटि एक भएउ । ना ओहि हिये माँझ डर गयऊ ॥

तेहि का कहिय जिउ रहै जो पीतम लागि ।
जहँ वह सुनै लेइ धँसि, का पानी, का आगि ॥15॥

 

पुनि धनि कनक=पानि मसि माँगी । उतर लिखत भीजी तन आँगी ॥
तस कंचन कहँ चहिय सोहागा । जौं निरमल नग होइ तौ लागा ॥
हौं जो गई सिव-मंडप भोरी । तहँवाँ कस न गाँठि तैं जोरी? ॥
भा बिसँभार देखि कै नैना । सखिन्ह लाज का बोलौं बैना?॥
खेलहिं मिस मैं चंदन घाला । मकु जागसि तौं देउँ जयमाला ॥
तबहुँ न जागा, गा तू सोई । जागे भेंट न सोए होई ॥
अब जौं सूर होइ चढ़ै अकासा । जौं जिउ देइ त आवै पासा ॥

तौ लगि भुगुति न लेइ सका रावन सिय जब साथ ।
कौन भरोसे अब कहौं? जीउ पराए हाथ ॥16॥

 

अब जौं सूर गगन चढ़ि आवै । राहु होइ तौ ससि कहँ पावै ॥
बहुतन्ह ऐस जीउ पर खेला । तू जोगी कित आहि अकेला ॥
बिक्रम धँसा प्रेम के बारा । सपनावति कहँ गएउ पतारा ॥
मधूपाछ मुगुधावति लागी । गगनपूर होइगा बैरागी ॥
राजकुँवर कंचनपुर गयऊ । मिरगावति कहँ जोगी भएऊ ॥
साध कुँवर खंडावत जोगू । मधु-मालति कर कीन्ह वियोगू ॥
प्रेमावति कहँ सुरपुर साधा । ऊषा लगि अनिरुध बर बाँधा ॥

हौं रानी पदमावती, सात सरग पर बास ।
हाथ चढ़ौं मैं तेहिके प्रथम करै अपनास ॥17॥

 

हौं पुनि इहाँ ऐस तोहि राती । आधी भेंट पिरीतम-पाती ॥
तहुँ जौ प्रीति निबाहै आँटा । भौंर न देख केत कर काँटा ॥
होइ पतंग अधरन्हु गहु दीया । लेसि समुद धँसि होइ सीप सेवाती ॥
चातक होइ पुकारु, पियासा । पीउ न पानि सेवाति कै आसा ॥
सारस कर जस बिछुरा जोरा । नैन होइ जस चंद चकोरा ॥
होहि चकोर दिस्टि ससि पाहाँ । औ रबि होहि कँवलदल माहाँ ॥

महुँ ऐसै होउँ तोहि कहँ, सकहि तौ ओर निबाहु ।
रोहु बेधि अरजुन होइ जीतु दुरपदी ब्याहु ॥18॥

 

राजा इहाँ ऐस तप झूरा । भा जरि बिरछ छार कर कूरा ।
नैन लाइ सो गएउ बिमोही । भा बिनु जिउ दीन्हेसि ओही ॥
कहाँ पिंगला सुखमन नारी । सूनि समाधि लागि गइ तारी ॥
बूँद समुद्र जैस होइ मेरा । गा हेराई अस मिलै न हेरा ।
रंगहि पान मिला जस होई । आपहि खोइ रहा होइ सोई ॥
सुऐ जाइ जब देखा तासू । नैन रकत भरि आए आँसू ॥
सदा पिरीतम गाढ़ करेई । ओहि न भुलाइ,भूलि जिउ देई ॥

मूरि सजीवन आनि कै औ मुख मेला नीर ।
गरुड़ पंख जस झारै अमृत बरसा कीर ॥19॥

 

मुआ जिया बास जो पावा । लीन्हेसि साँस, पेट जिउ आवा ॥
देखेसि जागि सिर नावा । पाती देइ मुख बचन सुनावा ॥
गुरू क बचन स्रवन दुइ मेला । कीन्ह सुदिस्टि, बेगु चलु चेला ॥
तोहि अलि कीन्ह आप भइ केवा । हौं पठवा गुरु बीच परेवा ॥
पौन साँस तोसौं मन लाई । जोवै मारग दिस्टि बिछाई ॥
जस तुम्ह कया कीन्ह अगि-दाहू । सो सब गुरु कहँ भएउ अगाहू ॥
तव उदंत लिखि दीन्हा । वेगि आउ, चअहै सिध कीन्हा ॥

आवहु सामि सुलचछना, जीउ बसै तुम्ह नाँव ।
नैनहिं भीतर पंथ है, हिरदय भीतर ठावँ ॥20॥

 

सुनि पदमावति कै असि मया । भा बसंत, उपनी नइ कया ॥
सुआ क बोल पौन होइ लागा । उठा सोइ, हनुवँत अस जागा ॥
चाँद मिलै कै दीन्हेसि आसा । सहसौ कला सूर परगासा ॥
पाति लीन्ह, लेइ सीस चढ़ावा । दीठि चकोर चंद जस पावा ॥
आस-पियासा जो जेहि केरा । जों झिझकार, ओहि सहुँ हेरा ॥
अब यह कौन पानि मैं पीया । भा तन पाँख, पतँग मरि जीया ॥
उठा फुलि हिरदय न समाना । कंथा टूक टूक बेहराना ॥

जहाँ पिरीतम वै बसहिं यह जिउ बलि तेहि बाट ।
वह जौ बोलावै पावँ सौं, हौं तहँ चलौ लिलाट ॥21॥

 

जो पथ मिला महेसहि सेई । गएउ समुद ओहि धँसि लेई ॥
जहँ वह कुंड विषम औगाहा । जाइ परा तहँ पाव न थाहा ॥
बाउर अंद पेम कर लागू । सौहँ धँसा, किछु सूझ न आगू ॥
लीन्हे सिधि साँसा मन मारा । गुरू मछंदरनाथ सँभारा ॥
चेला परे न छाँड़हि पाछू । चेला मच्छ, गुरू जस काछू ॥
जस धँसि लीन्ह समुद मरजीया । उघरे नैन, बरै जस दीया ॥
खोजि लीन्ह सो सरग-दुआरा । बज्र जो मूँदे जाइ उघारा ॥

बाँक चढ़ाव सरग-गढ़, चढ़त गएउ होइ भोर ।
भइ पुकार गढ़ ऊपर, चढ़े सेंधि देइ चोर ॥22॥

 

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