राघव-चेतन-देस-निकाला-खंड-पद्मावत -मलिक मुहम्मद जायसी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Malik Muhammad Jayasi

राघव-चेतन-देस-निकाला-खंड-पद्मावत -मलिक मुहम्मद जायसी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Malik Muhammad Jayasi

राघव चेतन चेतन महा । आऊ सरि राजा पहँ रहा ॥
चित चेता जाने बहु भेऊ । कबि बियास पंडित सहदेऊ ॥
बरनी आइ राज कै कथा । पिंगल महँ सब सिंघल मथा ॥
जो कबि सुनै सीस सो धुना । सरवन नाद बेद सो सुना ॥
दिस्टि सो धरम-पंथ जेहि सूझा । ज्ञान सो जो परमारथ बूझा ॥
जोगि, जो रहै समाधि समाना । भोगि सो, गुनी केर गुन जाना ॥
बीर जो रिस मारै, मन गहा । सोइ सिगार कंत जो चहा ॥

बेग-भेद जस बररुचि, चित चेता तस चेत ।
राजा भोज चतुरदस,भा चेतन सौं हेत ॥1॥

 

होइ अचेत घरी जौ आई । चेतन कै सब चेत भुलाई ॥
भा दिन एक अमावस सोई । राजै कहा `दुइज कब होई?’॥
राघव के मुख निकसा `आजू’ । पंडितन्ह कहा`काल्हि, महराजू’ ॥
राजै दुवौ दिसा फिरि देखा । इन महँ को बाउर, को सरेखा ॥
भुजा टेकि पंडित तब बोला । `छाँडहिं देस बचन जौ डोला’ ॥
राघव करै जाखिनी-पूजा । चहै सो भाव देखावै दूजा ॥
तेहि ऊपर राघव बर खाँचा । `दुइज आजु तौ पँडित साँचा’ ॥

राघव पूजि जाखिनी, दुइज देखाएसि साँझ ।
बेद-पंथ जे नहिं चलहिं ते भूलहिं बन माँझ ॥2॥

 

पँडितन्ह कहा परा नहिं धोखा । कौन अगस्त समुद जेइ सोखा ॥
सो दिन गएउ साँझ भइ दूजी । देखी दुइज घरी वह पूजी ॥
पँडितन्ह राजहि दीन्ह असीसा । अब कस यह कंचन और सीसा ॥
जौ यह दुइज काल्हि कै होती । आजु तेज देखत ससि-जोती ॥
राघव दिस्टिबंध कल्हि खेला । सभा माँझ चेटक अस मेला ॥
एहि कर गुरु चमारिन लोना । सिखा काँवरू पाढ़न टोना ॥
दुइज अमावस कहँ जो देखावै । एक दिन राहु चाँद कहँ लावै ॥

राज-बार अस गुनी न चाहिय जेहि टोना कै खोज ।
एहि चेटक औ विद्या छला जो राजा भोज ॥3॥

 

राघव -बैन जो कंचन रेखा । कसे बानि पीतर अस देखा ॥
अज्ञा भई, रिसअन नरेसू । मारहु नाहिं, निसारहु देसू ॥
झूठ बोलि थिर रहै न राँचा । पंडित सोइ बेद-मत-साँचा ॥
वेद-वचन मुख साँच जो कहा । सो जुग-जुग अहथिर होइ रहा ॥
खोट रतन सोई फटकारै । केहि घर रतन जो दारिद हरै?॥
चहै लच्छि बाउर कबि सोई । जहँ सुरसती, लच्छि कित होई?॥
कविता-सँग दारिद मतिभंगी । काँटे-कूँट पुहुप कै संगी ॥

कवि तौ चेला, विधि गुरू; सीप सेवाती-बूँद ।
तेहि मानुष कै आस का जौ मरजिया समुंद?॥4॥

 

एहि रे बात पदमावति सुनी । देस निसारा राघव गुनी ॥
ज्ञान-दिस्टि धनि अगम बिचारा । भल न कीन्ह अस गुनी निसारा ॥
जेइ जाखिनी पूजि ससि काढ़ा । सूर के ठाँव करै पुनि ठाढ़ा ॥
कवि कै जीभ खड़ग हरद्वानी । एक दिसि आगि, दुसर दिसि पानी ॥
जिनि अजुगुति काढ़ै मुख भोरे । जस बहुते, अपजस होइ थोरे ॥
रानी राघव बेगि हँकारा । सूर-गहन भा लेहु उतारा ॥
बाम्हन जहाँ दच्छिना पावा । सरग जाइ जौ होई बोलावा ।

आवा राघव चेतन, धौराहर के पास ।
ऐस न जाना ते हियै, बिजुरी बसै अकास ॥5॥

 

पदमावति जो झरोखे आई । निहकलंक ससि दीन्ह दिखाई ॥
ततखन राभव दीन्ह असीसा । भएउ चकोर चंदमुख दीसा ॥
पहिरे ससि नखतन्ह कै मारा । धरती सरग भएउ उजियारा ॥
औ पहिरै कर कंकन-जोरी । नग लागे जेहि महँ नौ कोरी ॥
कँकन एक कर काढ़ि पवारा । काढ़त हार टूट औ मारा ॥
जानहुँ चाँद टूट लेइ तारा । छुटी अकास काल कै धारा ॥
जानहु टूटि बीजु भुइँ परी । उठा चौधि राघव चित हरी ॥

परा आइ भुइँ कंकन, जगत भएउ उजियार ।
राघव बिजुरी मारा, बिसँभर किछ न सँभार ॥6॥

 

पदमावति हँसि दीन्ह झरोखा । जौ यह गुनी मरै, मोहिं दोखा ॥
सबै सहेली दैखै धाईं । `चेतन चेतु’ जगावहिं आई ॥
चेतन परा, न आवै चैतू । सबै कहा `एहि लाग परेतु’ ॥
कोई कहै, आहि सनिपातू । कोई कहै, कि मिरगी बातू ॥
कोइ कह, लाग पवन झर झोला । कैसेहु समुझि न चेतन बोला ॥
पुनि उठाइ बैठाएन्हि छाहाँ पूछहिं, कौन पीर हिय माहाँ?॥
दहुँ काहू के दरसन हरा । की ठग धूत भूत तोहि छरा ॥

की तोहि दीन्ह काहु किछु, की रे डसा तोहि साँप?।
कहु सचेत होइ चेतन, देह तोरि कस काँप ॥7॥

 

भएउ चेत चेतन चित चेता । नैन झरोखे, जीउ सँकेता ॥
पुनि जो बोला मति बुधि खोवा । नैन झरोखा लाए रोवा ॥
बाउर बहिर सीस पै धूना । आपनि कहै, पराइ न सुना ॥
जानहु लाई काहु ठगौरी । खन पुकार, खन बातैं बौरी ॥
हौं रे ठगा एहि चितउर माहाँ । कासौं कहौं, जाउँ केहि पाहाँ॥
यह राजा सठ बड़ हत्यारा । जेइ राखा अस ठग बटपारा ॥
ना कोइ बरज, न लाग गोहारी । अस एहि नगर होइ बटपारी ॥

दिस्टि दीन्ह ठगलाडू, अलक-फाँस परे गीउ ।
जहाँ भिखारि न बाँचै, तहाँ बाँच को जीऊ?॥8॥

 

कित धोराहर आइ झरोखे?। लेइ गइ जीउ दच्छिना-धोखे ॥
सरग ऊइ ससि करै अँजोरी । तेहि ते अधिक देहुँ केहि जोरी?॥
तहाँ ससिहि जौ होति वह जोती । दिन होइ राति, रैनि कस होती?॥
तेइ हंकारि मोहिं कँकन दीन्हा । दिस्टि जो परी जीउ हरि लीन्हा ॥
नैन-भिखारि ढीठ सतछँडा । लागै तहाँ बान होइ गडा ॥
नैनहिं नैन जो बेधि समाने । सीस धुनै निसरहिं नहिं ताने ॥
नवहिं न आए निलज भिखारी । तबहिं न लागि रही मुख कारी ॥

कित करमुहें नैन भए, जीउ हरा जेहि वाट ।
सरवर नीर-निछोह जिमि दरकि दरकि हिय फाट ॥9॥

 

सखिन्ह कहा चेतसि बिसँमारा । हिये चेतु जेहि जासि न मारा ॥
जौ कोइ पावै आपन माँगा । ना कोइ मरै, न काहू खाँगा ॥
वह पदमावति आहि अनूपा । बरनि न जाइ काहु के रूपा ॥
जो देखा सो गुपुत चलि गएउ । परगट कहाँ, जीउ बिनु भएउ ॥
तुम्ह अस बहुत बिमोहित भए । धुनि धुनि सीस जीउ देइ गए ॥
बहुतन्ह दीन्ह नाइ कै गीवा । उतर देइ नहिं, मारै जीवा ॥
तुइँ पै मरहिं होइ जरि भूई । अबहुँ उघेलु कान कै रूई ॥

कोइ माँगे नहिं पावै, कोइ माँगे बिनु पाव ।
तू चेतन औरहि समुझावै, तोकहँ को समुझाव?॥10॥

 

भएउ चेत, चित चेतन चेता । बहुरि न आइ सहौं दुख एता ॥
रोवत आइ परे हम जहाँ ।रोवत चले, कौन सुख तहाँ?॥
जहाँ रहे संसौ जिउ केरा । कौन रहनि? चलि चलै सबेरा ॥
अब यह भीख तहाँ होइ मागौं । देइ एत जेहि जनम न खाँगौं ॥
अस कंकन जौ पावौं दूजा । दारिद हरै, आस मन पूजा ॥
दिल्ली नगर आदि तुरकानू । जहाँ अलाउदीन सुलतानू ॥
सोन ढरै जेहि के टकसारा । बारह बानी चलै दिनारा ॥

कँवल बखानौं जाइ तहँ जहँ अलि अलाउदीन ।
सुनि कै चढ़ै भानु होइ, रतन जो होइ मलीन ॥11॥

 

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