राग सारंग-प्रेममालिका -भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

राग सारंग-प्रेममालिका -भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

आव पिय पलकन पै धरि पाँव

आव पिय पलकन पै धरि पाँव।
ठीक दुपहरी तपत भूमि में नांगे पद मत आव॥
करुना करि मेरो कह्यौ मानि कैं धूपहि में मति धाव।
मुरझानो लागत मुख-पंकज चलत चहूँ दिसि दाव॥
जा पद कों निज कुच अरु कर पैधरत करत सकुचाव।
जाको कमला राखत है नित कर में करि करि चाव॥
जमैं कली चुभत कुसुमन की कोमल अतिहि सुभाव।
जो मन हृदय-कमल पै बिहरत इसि-दिन प्रेम-प्रभाव॥
सोइ कोमल चरनन सों मो हित धावत हौ ब्रजराव।
‘हरीचंद’ ऐसो मति कीजै सह्यौ न जात बनाव॥

नैना मानत नाहीं, मेरे नैना मानत नाहीं

नैना मानत नाहीं, मेरे नैना मानत नाहीं।
लोक-लाज सीकर में जकरे तऊ उतै खिंच जाहीं॥
पचि हारे गुरुजन सिख दै कै सुनत नहीं कछु कान।
मानत कह्यौ नाहिं काहू को, जानत भए अजान॥
निज चबात सुनि औरहु हरखत, उलटी रीति चलाई।
मदिरा प्रेम पिये पागल ह्वै इत उत डोलत धाई॥
पर-बस भए मदन-मोहन के रंग रँगे सब त्यागी।
‘हरीचंद’ तजि मुख कमलन अलि रहैं कितै अनुरागी॥

नैन भरि देखि लेहु यह जोरी

नैन भरि देखि लेहु यह जोरी।
मनमोहन सुंदर नटनागर, श्री वृषभानु-किसोरी॥
कहा कहौं छबि कहि नहिं आवै, वे साँवर यह गोरी।
ये नीलाम्बर सारी पहिनें, उनको पीत पिछौरी॥
एक रूप एक भेस एक बय, बरनि सकै कवि को री।
‘हरीचंद’ दोऊ कुंजन ठाढ़े, हँसत करत चित-चोरी॥

सखी री देखहु बाल-बिनोद

सखी री देखहु बाल-बिनोद ।
खेलत राम-कृष्ण दोऊ आँगन किलकत हँसत प्रमोद ।।
कबहुँ घूटूरुअन दौरत दोऊ मिलि धूल-धूसरित गात ।
देखि-देखि यह बाल चरित छबि, जननी बलि-बलि जात ।।
झगरत कबहुँ दोऊ आनंद भरि, कबहुँ चलत हैं धाय ।
कबहुँ गहत माता की चोटी, माखन माँगत आय ।।
घर घर तें आवत ब्रजनारी, देखन यह आनंद ।
बाल रूप क्रीड़त हरि आँगन, छबि लखि बलि ‘हरिचंद’ ।।

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