राग रामकली-प्रेममालिका -भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

राग रामकली-प्रेममालिका -भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

 

ऐसी नहिं कीजै लाल

ऐसी नहिं कीजै लाल, देखत सब संग को बाल;
काहे हरि गए आजु बहुतै इतराई।
सूधे क्यौं न दान लेहु, अँचरा मेरो छाँड़ि देहु;
जामैं मेरी लाज रहै, करौ सो उपाई।
जानत ब्रज प्रीत सबै, औरहू हँसेंगे अबै;
गोकुल के लोग होत बड़े ही चवाई।
‘हरीचंद’ गुप्त प्रीति, बरसत अति रस की रीति;
नेकहू जो जानै कोई, प्रगटत रस जाई॥

छाँड़ो मेरी बहियाँ लाल

छाँड़ो मेरी बहियाँ लाल, सीखी यह कौन चाल;
हा हा तुम परसत तन, औरन की नारी।
अँगुरी मेरी मुरुक गई, परसत तन पीर भई;
भीर भई देखत सब ठाढ़ीं ब्रज-नारी।
बाट परौ ऐसी बात, मोहिं तौ नहीं सुहात;
काहे इतरात करत अपनो हठ भारी।
‘हरीचंद’ लेहु दान, नाहीं तौ परैगी जान;
नैंक करौ लाज, छाँड़ौ अंचल गिरिधारी॥

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