राग भैरव-प्रेममालिका -भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

राग भैरव-प्रेममालिका -भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

 लाल यह बोहनियाँ की बेरा

लाल यह बोहनियाँ की बेरा।
हौं अबहीं गोरस लै निकसी बेचन काज सबेरा।
तुम तौ याही ताक रहत हौ, करत फिरत मग फेरा।
‘हरीचंद’ झगरौ मति ठानौ ह्वैहै आजु निबेरा॥
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ऊधो जो अनेक मन होते

ऊधो जो अनेक मन होते
तो इक श्याम-सुन्दर को देते, इक लै जोग संजोते।

एक सों सब गृह कारज करते, एक सों धरते ध्यान।
एक सों श्याम रंग रंगते, तजि लोक लाज कुल कान।

को जप करै जोग को साधै, को पुनि मूँदे नैन।
हिए एक रस श्याम मनोहर, मोहन कोटिक मैन।

ह्याँ तो हुतो एक ही मन, सो हरि लै गये चुराई।
‘हरिचंद’ कौउ और खोजि कै, जोग सिखावहु जाई॥

ब्रज के लता पता मोहि कीजै

ब्रज के लता पता मोहि कीजै ।
गोपी पद-पंकज पावन की रज जामैं सिर भीजै ।
आवत जात कुंज की गलियन रूप सुधा नित पीजै ।
श्री राधे राधे मुख यह बर मुंह मांग्यौ हरि दीजै ।

विनती सुन नन्द-लाल

विनती सुन नन्द-लाल बरजो क्यौं न अपनो बाल ।
प्रातकाल आइ आइ, अम्बर लै भागे ।
भोर होत जमुन तीर जुरि जुरि सब गोपी भोर
न्हात जबै बिमल नीर शीत अतिहि जागै ।
लेत बसन मन चुराइ कदम चढ़त तुरत धाइ
ठाढ़ी हम नीर माहिं नांगी सकुचाहीं ।
‘हरीचंद’ ऐसो हाल करत नित्य प्रति गोपाल
ब्रज में कहो कैसे बसैं, अब निबाह नाहीं ।

मारग रोकि भयो ठाढ़ो

मारग रोकि भयो ठाढ़ो, जान न देत मोहि पूछत है तू को री ।
कौन गाँव कहा नाँव तिहारो ठाढ़ि रहि नेक गोरी ।।
‘हरीचन्द’ मिलि विहरत दोऊ रैननि नन्दकुंवर वृषभानु किशोरी ।।

 प्यारै जू तिहारी प्यारी

प्यारै जू तिहारी प्यारी अति ही गरब भरी ।
हठ की हठीली ताहि आपु ही मनाइए ।
नैकहू न माने सब भाँति हौं मनाय हारी
आपुहि चलिए ताहि बात बहराइए ।
जैसे बनै तैसे ताहि पग पिर लाइए ।।

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