राग केदारा चौताल-प्रेममालिका -भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

राग केदारा चौताल-प्रेममालिका -भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

अरी हरि या मग निकसे आइ अचानक

अरी हरि या मग निकसे आइ अचानक, हों तो झरोखे ठाढ़ी।
देखत रूप ठगौरी सी लागी, बिरह-बेलि उर बाढ़ी॥
गुरुजन के भय संग गई नहिं, रह गई मनौ चित्र लिखि काढ़ी।
‘हरीचंद’ बलि ऐसी लाज में लगौ री आग, हौं बिरह दुख दाढ़ी॥

अरी सखि गाज परौ ऐसी लोक-लाज पै

अरी सखि गाज परौ ऐसी लोक-लाज पै, मदन-मोहन संग जान न पाई।
हौं तो झरोखे ठाढ़ी देखत ही कछु, आए इतै में कन्हाई॥
औचक दीठि परी मेरे तन, हँसि कछु बंसी बजाई।
‘हरीचंद’ मोहिं बिबस छोड़ि कैं, तन-मन लीनौं संग लाई॥

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