रहु वे अड़्या तूं रहु वे अड़्या-पंजाबी काफ़ियाँ शाह शरफ़-शाह शरफ़ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shah Sharaf

रहु वे अड़्या तूं रहु वे अड़्या-पंजाबी काफ़ियाँ शाह शरफ़-शाह शरफ़ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shah Sharaf

रहु वे अड़्या तूं रहु वे अड़्या,
बोलनि दी जाय नहीं वे अड़्या,
जो बोले सो मारीए मनसूर जिवें
कोयी बुझदा नाहीं वे अड़्या ।१।रहाउ।

जै तै हक दा राह पछाता,
दम ना मार वे तूं रहीं चुपाता,
जो देवी सो सहु वे अड़्या ।१।

कदम ना पाछे देयी हालों,
तोड़े सिर वखि कीचै धड़ि नालों,
तां भी हाल ना कहीं वे अड़्या ।२।

गोरि निमानी विचि पउदियां कहियां,
हूहु हवायी तेरी इत्थे ना रहियां,
जांझी मांझी मुड़ि घरि आए,
महलीं वड़्या सहु वे अड़्या ।३।

शेख़ शरफ़ इह बात बताई,
करमु ल्या लिख्या भाई,
कर शुकराना बहु वे अड़्या ।४।
(राग आसावरी)

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