रहता उद्यत-मैं मिलिट्री का बूढ़ा घोड़ा -नागार्जुन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nagarjun 

रहता उद्यत-मैं मिलिट्री का बूढ़ा घोड़ा -नागार्जुन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nagarjun

रहता था उद्यत प्रतिपल
भर लेने को मित्र सुलभ बाहु-पाश में
रहता था उद्यत प्रतिपल
धनुष की प्रत्यंचा पर साधे तीर
शत्रु के सन्धान में

रहता था उद्यत प्रतिपल
सद्गुरु निदेशित
यौगिक अनुष्ठान की खातिर

वही मेरे ये बाहु-युगल
सम्प्रति यों ही झूल रहे हैं
अनेक प्रयत्न करने पर भी
मैं इसे उठा नहीं पाता
हिला-डुला नहीं पाता
मेरे बाहु-युगल को इस क्षण
पूरा का पूरा लकवा मार गया है

उद्यत रहता था प्रतिपल
उफनते भादों में उद्दाम
भागीरथी की बाढ़ में विलुप्त कूल-कछार में
लगाकर छलाँग, तैर जाने के लिए इस पार से उस पार

रहता था उद्यत प्रतिपल
उफनाते भादों में लगाकर छलाँग !

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