रश्मि-महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Rashmi Part 1

रश्मि-महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Rashmi Part 1

रश्मि (कविता)

चुभते ही तेरा अरुण बान!
बहते कन कन से फूट फूट,
मधु के निर्झर से सजल गान।

इन कनक रश्मियों में अथाह,
लेता हिलोर तम-सिन्धु जाग;
बुदबुद से बह चलते अपार,
उसमें विहगों के मधुर राग;
बनती प्रवाल का मृदुल कूल,
जो क्षितिज-रेख थी कुहर-म्लान।

नव कुन्द-कुसुम से मेघ-पुंज,
बन गए इन्द्रधनुषी वितान;
दे मृदु कलियों की चटक, ताल,
हिम-बिन्दु नचाती तरल प्राण;
धो स्वर्णप्रात में तिमिरगात,
दुहराते अलि निशि-मूक तान।

सौरभ का फैला केश-जाल,
करतीं समीरपरियां विहार;
गीलीकेसर-मद झूम झूम,
पीते तितली के नव कुमार;
मर्मर का मधु-संगीत छेड़,
देते हैं हिल पल्लव अजान!

फैला अपने मृदु स्वप्न पंख,
उड़ गई नींदनिशि क्षितिज-पार;
अधखुले दृगों के कंजकोष–
पर छाया विस्मृति का खुमार;
रंग रहा हृदय ले अश्रु हास,
यह चतुर चितेरा सुधि विहान!

गीत-1

क्यों इन तारों को उलझाते?
अनजाने ही प्राणों में क्यों,
आ आ कर फिर जाते?

पल में रागों को झंकृत कर,
फिर विराग का अस्फुट स्वर भर,
मेरी लघु जीवन वीणा पर,
क्या यह अस्फुट गाते?

लय में मेरा चिर करुणा-धन,
कम्पन में सपनों का स्पन्दन,
गीतों में भर चिर सुख, चिर दुख,
कण कण में बिखराते!

मेरे शैशव के मधु में घुल,
मेरे यौवन के मद में ढुल,
मेरे आँसू स्मित में हिल मिल,
मेरे क्यों न कहाते?

जीवन दीप

किन उपकरणों का दीपक,
किसका जलता है तेल?
किसकी वृत्ति, कौन करता
इसका ज्वाला से मेल?

शून्य काल के पुलिनों पर-
जाकर चुपके से मौन,
इसे बहा जाता लहरों में
वह रहस्यमय कौन?

कुहरे सा धुँधला भविष्य है,
है अतीत तम घोर ;
कौन बता देगा जाता यह
किस असीम की ओर?

पावस की निशि में जुगनू का-
ज्यों आलोक-प्रसार।
इस आभा में लगता तम का
और गहन विस्तार।

इन उत्ताल तरंगों पर सह-
झंझा के आघात,
जलना ही रहस्य है बुझना –
है नैसर्गिक बात !

आह्वान

फूलों का गीला सौरभ पी
बेसुध सा हो मन्द समीर,
भेद रहे हों नैश तिमिर को
मेघों के बूँदों के तीर।

नीलम-मन्दिर की हीरक—
प्रतिमा सी हो चपला निस्पन्द,
सजल इन्दुमणि से जुगनू
बरसाते हों छबि का मकरन्द।

बुदबुद को लड़ियों में गूंथा
फैला श्यामल केश-कलाप,
सेतु बांधती हो सरिता सुन—
सुन चकवी का मूक विलाप।

तब रहस्यमय चितवन से-
छू चौंका देना मेरे प्राण,
ज्यों असीम सागर करता है
भूले नाविक का आह्वान।

मेरा पता

स्मित तुम्हारी से छलक यह ज्योत्स्ना अम्लान,
जान कब पाई हुआ उसका कहां निर्माण!

अचल पलकों में जड़ी सी तारकायें दीन,
ढूँढती अपना पता विस्मित निमेषविहीन।

गगन जो तेरे विशद अवसाद का आभास,
पूछ्ता ’किसने दिया यह नीलिमा का न्यास’।

निठुर क्यों फैला दिया यह उलझनों का जाल,
आप अपने को जहां सब ढूँढते बेहाल।

काल-सीमा-हीन सूने में रहस्यनिधान!
मूर्तिमत कर वेदना तुमने गढ़े जो प्राण;

धूलि के कण में उन्हें बन्दी बना अभिराम,
पूछते हो अब अपरिचित से उन्हीं का नाम!

पूछ्ता क्या दीप है आलोक का आवास?
सिन्धु को कब खोजने लहरें उड़ी आकाश!

धड़कनों से पूछ्ता है क्या हृदय पहिचान?
क्या कभी कलिका रही मकरन्द से अनजान?

क्या पता देते घनों को वारि-बिन्दु असार?
क्या नहीं दृग जानते निज आँसुवों का भार?

चाह की मृदु उंगलियों ने छू हृदय के तार,
जो तुम्हीं में छेड़ दी मैं हूँ वही झंकार?

नींद के नभ में तुम्हारे स्वप्नपावस-काल,
आँकता जिसको वही मैं इन्द्रधनु हूँ बाल।

तृप्तिप्याले में तुम्हीं ने साध का मधु घोल,
है जिसे छलका दिया मैं वही बिन्दु अमोल।

तोड़ कर वह मुकुर जिसमें रूप करता लास,
पूछ्ता आधार क्या प्रतिबिम्ब का आवास?

उर्म्मियों में झूलता राकेश का अभास,
दूर होकर क्या नहीं है इन्दु के ही पास?

इन हमारे आँसुवों में बरसते सविलास–
जानते हो क्या नहीं किसके तरल उच्छवास?

इस हमारी खोज में इस वेदना में मौन,
जानते हो खोजता है पूर्ति अपनी कौन?

यह हमारे अन्त उपक्रम यह पराजय जीत,
क्या नहीं रचता तुम्हारी सांस का संगीत?

पूछ्ते फिर किसलिए मेरा पता बेपीर!
हृदय की धड़कन मिली है क्या हृदय को चीर?

अलि से

इन आँखों ने देखी न राह कहीं,
इन्हें धोगया नेह का नीर नहीं;
करती मिट जाने की साध कभी,
इन प्राणों को मूक अधीर नहीं;
अलि छोड़ी न जीवन की तरिणी,
उस सागर में जहां तीर नहीं!
कभी देखा नहीं वह देश जहां,
प्रिय से कम मादक पीर नहीं!

जिसको मरुभूमि समुद्र हुआ,
उस मेघव्रती की प्रतीति नहीं;
जो हुआ जल दीपकमय उससे,
कभी पूछी निबाह की रीति नहीं;
मतवाले चकोर से सीखी कभी,
उस प्रेम के राज्य की नीति नहीं;
तू अकिंचन भिक्षुक है मधु का,
अलि तृप्ति कहाँ जब प्रीति नहीं!

पथ में नित स्वर्ण-पराग बिछा,
तुझे देख जो फूली समाती नहीं;
पलकों से दलों में घुला मकरन्द,
पिलाती कभी अनखाती नहीं
किरणों में गुँथीं मुक्तावलियाँ,
पहनाती रही सकुचाती नहीं;
अब भूल गुलाब में पंकज की,
अलि कैसे तुझे सुधि आती नहीं!

करते करुणा-घन छांह वहां,
झुलसाया निदाघ सा दाह नहीं;
मिलती शुचि आँसुओं की सरिता,
मृगवारि का सिन्धु अथाह नहीं;
हँसता अनुराग का इन्दु सदा,
छलना की कुहू का निबाह नहीं;
फिरता अलि भूल कहाँ भटका,
यह प्रेम के देश कि राह नहीं!

दुविधा

कह दे माँ क्या अब देखूँ !

देखूँ खिलती कलियाँ या
प्यासे सूखे अधरों को,
तेरी चिर यौवन-सुषमा
या जर्जर जीवन देखूँ !

देखूँ हिम-हीरक हँसते
हिलते नीले कमलों पर,
या मुरझायी पलकों से
झरते आँसू-कण देखूँ!

सौरभ पी पी कर बहता
देखूं यह मन्द समीरण,
दुख की घूँटें पीती या
ठंडी साँसों को देखूँ !

खेलूं परागमय मधुमय
तेरी वसंत छाया में,
या झुलसे संतापों से
प्राणों का पतझर देखूँ !

मकरन्द-पगी केसर पर
जीती मधुपरियाँ ढूँढूं,
या उरपंजर में कण को
तरसे जीवनशुक देखूँ!

कलियों की घन-जाली में
छिपती देखूँ लतिकाएँ
या दुर्दिन के हाथों में
लज्जा की करूणा देखूँ !

बहलाऊँ नव किसलय के-
झूले में अलिशिशु तेरे,
पाषाणों में मसले या
फूलों से शैशव देखूँ!

तेरे असीम आंगन की
देखूँ जगमग दीवाली,
या इस निर्जन कोने के
बुझते दीपक को देखूँ !

देखूँ विहगों का कलरव
घुलता जल की कलकल में,
निस्पन्द पड़ी वीणा से
या बिखरे मानस देखूँ!

मृदु रजतरश्मियां देखूँ
उलझी निद्रा-पंखों में,
या निर्निमेष पलकों में
चिन्ता का अभिनय देखूँ!

तुझ में अम्लान हँसी है
इसमें अजस्र आंसू-जल,
तेरा वैभव देखूँ या
जीवन का क्रन्दन देखूँ !

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