रश्मि-महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Rashmi Part 4

रश्मि-महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Rashmi Part 4

उनसे

विहग-शावक से जिस दिन मूक,
पड़े थे स्वप्ननीड़ में प्राण;
अपरिचित थी विस्मृति की रात,
नहीं देखा था स्वर्णविहान।

रश्मि बन तुम आए चुपचाप,
सिखाने अपने मधुमय गान;
अचानक दीं वे पलकें खोल,
हृदय में बेध व्यथा का बान–
हुए फिर पल में अन्तर्धान!

रंग रही थी सपनों के चित्र,
हृदयकलिका मधु से सुकुमार;
अनिल बन सौ सौ बार दुलार,
तुम्हीं ने खुलवाये उर-द्वार।

–और फिर रहे न एक निमेष,
लुटा चुपके से सौरभ-भार;
रह गई पथ में बिछ कर दीन,
दृगों की अश्रुभरी मनुहार–
मूक प्राणों की विफल पुकार!

विश्ववीणा में कब से मूक,
पड़ा था मेरा जीवनतार;
न मुखरित कर पाईं झकझोर–
थक गईं सौ सौ मलयबयार।

तुम्हीं रचते अभिनव संगीत,
कभी मेरे गायक इस पार;
तुम्हीं ने कर निर्मम आघात
छेड़ दी यह बेसुध झंकार–
और उलझा डाले सब तार!

 उलझन

अलि कैसे उनको पाऊँ?

वे आँसू बनकर मेरे,
इस कारण ढुल ढुल जाते,
इन पलकों के बन्धन में,
मैं बांध बांध पछताऊँ।

मेघों में विद्युत सी छवि,
उनकी बनकर मिट जाती,
आँखों की चित्रपटी में,
जिसमें मैं आंक न पाऊँ।

वे आभा बन खो जाते,
शशि किरणों की उलझन में;
जिसमें उनको कण कण में
ढूँढूँ पहिचान न पाऊँ।

सोते सागर की धड़कन–
बन, लहरों की थपकी से;
अपनी यह करुण कहानी,
जिसमें उनको न सुनाऊँ।

वे तारक बालाओं की,
अपलक चितवन बन आते;
जिसमें उनकी छाया भी,
मैं छू न सकूँ अकुलाऊँ।

वे चुपके से मानस में,
आ छिपते उच्छवासें बन;
जिसमें उनको सांसो में,
देखूँ पर रोक न पाऊँ।

वे स्मृति बनकर मानस में,
खटका करते हैं निशिदिन;
उनकी इस निष्ठुरता को,
जिसमें मैं भूल न जाऊँ।

देखो !

तेरी आभा का कण नभ को,
देता अगिणत दीपक दान;
दिन को कनक राशि पहनाता,
विधु को चाँदी-सा परिधान;

करुणा का लघु बिन्दु युगों से,
भरता छलकाता नव घन;
समा न पाता जग के छोटे,
प्याले में उसका जीवन।

तेरी महमा की छाया-छवि,
छू होता वागीश अपार;
नील गगन पा लेता घन-सा,
तम-सा अन्तहीन विस्तार।

सुषमा का कण एक खिलाता,
राशि-राशि फूलों के वन;
शत शत झंझावात प्रलय-
बनता पल में भू-संचालन!

सच है कण का पार न पाया,
बन बिगड़े असंख्य संसार;
पर न समझना देव हमारी-
लघुता है जीवन की हार !

लघु प्राणों के कोने में
खोयी असीम पीड़ा देखो;
आयो हे निस्सीम ! आज
इस रजकण की महिमा देखो !

पपीहे के प्रति

जिसको अनुराग सा दान दिया,
उससे कण मांग लजाता नहीं;
अपनापन भूल समाधि लगा,
यह पी का विहाग भुलाता नहीं;
नभ देख पयोधर श्याम घिरा,
मिट क्यों उसमें मिल जाता नहीं?
वह कौन सा पी है पपीहा तेरा,
जिसे बांध हृदय में बसाता नहीं!

उसको अपना करुणा से भरा,
उर सागर क्यों दिखलाता नहीं?
संयोग वियोग की घाटियों में
नव नेह में बांध झुलाता नहीं;
संताप के संचित आँसुवों से,
नहलाके उसे तु धुलाता नहीं;
अपने तमश्यामल पाहुन को,
पुतली की निशा में सुलाता नहीं!

कभी देख पतंग को जो दुख से
निज, दीपशिखा को रुलाता नहीं;
मिल ले उस मीन से जो जल की,
निठुराई विलाप में गाता नहीं;
कुछ सीख चकोर से जो चुगता
अंगार, किसी को सुनाता नहीं;
अब सीख ले मौन का मन्त्र नया,
यह पी पी घनों को सुहाता नहीं।

जब

नींद में सपना बन अज्ञात!
गुदगुदा जाते हो जब प्राण,
ज्ञात होता हँसने का मर्म
तभी तो पाती हूँ यह जान,

प्रथम छूकर किरणों की छांह
मुस्करातीं कलियाँ क्यों प्रात;
समीरण का छूकर चल छोर
लोटते क्यों हँस हँस कर पात!

प्रथम जब भर आतीं चुपचाप
मोतियों से आँखें नादान,
आँकती तब आँसू का मोल
तभी तो आ जाता यह ध्यान;

घुमड़ घिर क्यों रोते नवमेघ
रात बरसा जाती क्यों ओस,
पिघल क्यों हिम का उर अवदात
भरा करता सरिता के कोष।

मधुर अपना स्पन्दन का राग
मुझे प्रिय जब पड़ता पहिचान!
ढूँढती तब जग में संगीत
प्रथम होता उर में यह भान;

वीचियों पर गा करुण विहाग
सुनाता किसको पारावार;
पथिक सा भटका फिरता वात
लिए क्यों स्वरलहरी का भार!

हृदय में खिल कलिका सी चाह
दृगों को जब देती मधुदान,
छलक उठता पुलकों से गात
जान पाता तब मन अनजान;

गगन में हँसता देख मयंक
उमड़ती क्यों जलराशि अपार
पिघल चलते विधुमणि के प्राण
रश्मियाँ छूते ही सुकुमार।

देख वारिद की धूमिल छांह
शिखीशावक क्यों होता भ्रान्त;
शलभकुल निज ज्वाला से खेल
नहीं फिर भी क्यों होता श्रान्त!

क्यों

सजनि तेरे दृग बाल!
चकित से विस्मृति से दृगबाल—

आज खोये से आते लौट,
कहाँ अपनी चंचलता हार?
झुकी जातीं पलकें सुकुमार,
कौन से नव रहस्य के भार?

सरल तेरा मृदु हास!
अकारण वह शैशव का हास—

बन गया कब कैसे चुपचाप,
लाजभीनी सी मृदु मुस्कान।
तड़ित सी जो अधरों की ओट,
झाँक हो जाती अन्तर्धान।

सजनि वे पद सुकुमार!
तरंगों से द्रुतपद सुकुमार—
सीखते क्यों चंचलगति भूल,
भरे मेघों की धीमी चाल?

तृषित कन कन को क्यों अलि चूम,
अरुण आभा सी देते ढाल?

मुकुर से तेरे प्राण,
विश्व की निधि से तेरे प्राण—

छिपाये से फिरते क्यों आज,
किसी मधुमय पीड़ा का न्यास?
सजल चितवन में क्यों है हास,
अधर में क्यों सस्मित निश्वास?

 

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