रश्मि-महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Rashmi Part 3

रश्मि-महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Rashmi Part 3

शून्यता में निद्रा की बन,

शून्यता में निद्रा की बन,
उमड़ आते ज्यों स्वप्निल घन;
पूर्णता कलिका की सुकुमार,
छलक मधु में होती साकार;

हुआ त्यों सूनेपन का भान,
प्रथम किसके उर में अम्लान?
और किस शिल्पी ने अनजान,
विश्व प्रतिमा कर दी निर्माण?
काल सीमा के संगम पर,
मोम सी पीड़ा उज्जवल कर।

उसे पहनाई अवगुण्ठन,
हास औ’ रोदन से बुन-बुन!

कनक से दिन मोती सी रात,
सुनहली सांझ गुलाबी प्रात;
मिटाता रंगता बारम्बार,
कौन जग का यह चित्राधार?

शून्य नभ में तम का चुम्बन,
जला देता असंख्य उडुगण;
बुझा क्यों उनको जाती मूक,
भोर ही उजियाले की फूंक?

रजतप्याले में निद्रा ढाल,
बांट देती जो रजनी बाल;
उसे कलियों में आंसू घोल,
चुकाना पड़ता किसको मोल?

पोछती जब हौले से वात,
इधर निशि के आंसू अवदात;
उधर क्यों हंसता दिन का बाल,
अरुणिमा से रंजित कर गाल?

कली पर अलि का पहला गान,
थिरकता जब बन मृदु मुस्कान,
विफल सपनों के हार पिघल,
ढुलकते क्यों रहते प्रतिपल?

गुलालों से रवि का पथ लीप,
जला पश्चिम मे पहला दीप,
विहँसती संध्या भरी सुहाग,
दृगों से झरता स्वर्ण पराग;
उसे तम की बढ़ एक झकोर,
उड़ा कर ले जाती किस ओर?

अथक सुषमा का स्रजन विनाश,
यही क्या जग का श्वासोच्छवास?

किसी की व्यथासिक्त चितवन,
जगाती कण कण में स्पन्दन;
गूँथ उनकी सांसो के गीत,
कौन रचता विराट संगीत?

प्रलय बनकर किसका अनुताप,
डुबा जाता उसको चुपचाप,

आदि में छिप जाता अवसान,
अन्त में बनता नव्य विधान;
सूत्र ही है क्या यह संसार,
गुंथे जिसमें सुखदुख जयहार?

 अतृप्ति

चिर तृप्ति कामनाओं का
कर जाती निष्फल जीवन,
बुझते ही प्यास हमारी
पल में विरक्ति जाती बन।

पूर्णता यही भरने की
ढुल, कर देना सूने घन;
सुख की चिर पूर्ति यही है
उस मधु से फिर जावे मन।

चिर ध्येय यही जलने का
ठंढी विभूति बन जाना;
है पीड़ा की सीमा यह
दुख का चिर सुख हो जाना!

मेरे छोटे जीवन में
देना न तृप्ति का कणभर;
रहने दो प्यासी आँखें
भरतीं आंसू के सागर।

तुम मानस में बस जाओ
छिप दुख की अवगुण्ठन से;
मैं तुम्हें ढूँढने के मिस
परिचित हो लूँ कण कण से।

तुम रहो सजल आँखों की
सित असित मुकुरता बन कर;
मैं सब कुछ तुम से देखूँ
तुमको न देख पाऊँ पर!

चिर मिलन विरह-पुलिनों की
सरिता हो मेरा जीवन;
प्रतिपल होता रहता हो
युग कूलों का आलिंगन!

इस अचल क्षितिज रेखा से
तुम रहो निकट जीवन के;
पर तुम्हें पकड़ पाने के
सारे प्रयत्न हों फीके।

द्रुत पंखोंवाले मन को
तुम अंतहीन नभ होना;
युग उड़ जावें उड़ते ही
परिचित हो एक न कोना!

तुम अमरप्रतीक्षा हो मैं
पग विरहपथिक का धीमा;
आते जाते मिट जाऊँ
पाऊँ न पंथ की सीमा।

तुम हो प्रभात की चितवन
मैं विधुर निशा बन आऊँ;
काटूँ वियोग-पल रोते
संयोग-समय छिप जाऊँ!

आवे बन मधुर मिलन-क्षण
पीड़ा की मधुर कसक सा;
हँस उठे विरह ओठों में—
प्राणों में एक पुलक सा।

पाने में तुमको खोऊँ
खोने में समझूँ पाना;
यह चिर अतृप्ति हो जीवन
चिर तृष्णा हो मिट जाना!

गूँथे विषाद के मोती
चाँदी की स्मित के डोरे;
हों मेरे लक्ष्य-क्षितिज की
आलोक तिमिर दो छोरें।

जीवन

तुहिन के पुलिनों पर छबिमान,
किसी मधुदिन की लहर समान;
स्वप्न की प्रतिमा पर अनजान,
वेदना का ज्यों छाया-दान;

विश्व में यह भोला जीवन—
स्वप्न जागृति का मूक मिलन,
बांध अंचल में विस्मृतिधन,
कर रहा किसका अन्वेषण?

धूलि के कण में नभ सी चाह,
बिन्दु में दुख का जलधि अथाह,
एक स्पन्दन में स्वप्न अपार,
एक पल असफलता का भार;

सांस में अनुतापों का दाह,
कल्पना का अविराम प्रवाह;
यही तो है इसके लघु प्राण,
शाप वरदानों के सन्धान!

भरे उर में छबि का मधुमास,
दृगों में अश्रु अधर में हास,
ले रहा किसका पावसप्यार,
विपुल लघु प्राणों में अवतार?

नील नभ का असीम विस्तार,
अनल के धूमिल कण दो चार,
सलिल से निर्भर वीचि-विलास
मन्द मलयानिल से उच्छ्वास,

धरा से ले परमाणु उधार,
किया किसने मानव साकार?
दृगों में सोते हैं अज्ञात
निदाघों के दिन पावस-रात;

सुधा का मधु हाला का राग,
व्यथा के घन अतृप्ति की आग।
छिपे मानस में पवि नवनीत,
निमिष की गति निर्झर के गीत,

अश्रु की उर्म्मि हास का वात,
कुहू का तम माधव का प्रात।
हो गये क्या उर में वपुमान,
क्षुद्रता रज की नभ का मान,

स्वर्ग की छबि रौरव की छाँह,
शीत हिम की बाड़व का दाह?
और—यह विस्मय का संसार,
अखिल वैभव का राजकुमार,

धूलि में क्यों खिलकर नादान,
उसी में होता अन्तर्धान?
काल के प्याले में अभिनव,
ढाल जीवन का मधु आसव,

नाश के हिम अधरों से, मौन,
लगा देता है आकर कौन?
बिखर कर कन कन के लघुप्राण,
गुनगुनाते रहते यह तान,

“अमरता है जीवन का ह्रास,
मृत्यु जीवन का परम विकास”।
दूर है अपना लक्ष्य महान,
एक जीवन पग एक समान;

अलक्षित परिवर्तन की डोर,
खींचती हमें इष्ट की ओर।
छिपा कर उर में निकट प्रभात,
गहनतम होती पिछली रात;

सघन वारिद अम्बर से छूट,
सफल होते जल-कण में फूट।
स्निग्ध अपना जीवन कर क्षार,
दीप करता आलोक-प्रसार;

गला कर मृतपिण्डों में प्राण,
बीज करता असंख्य निर्माण।
सृष्टि का है यह अमिट विधान,
एक मिटने में सौ वरदान,
नष्ट कब अणु का हुआ प्रयास,
विफलता में है पूर्ति-विकास।

आशा

वे मधुदिन जिनकी स्मृतियों की
धुँधली रेखायें खोईं,
चमक उठेंगे इन्द्रधनुष से
मेरे विस्मृति के घन में।

झंझा की पहली नीरवता—
सी नीरव मेरी साधें,
भर देंगी उन्माद प्रलय का
मानस की लघु कम्पन में।

सोते जो असंख्य बुदबुद से
बेसुध सुख मेरे सुकुमार,
फूट पड़ेंगे दुखसागर की
सिहरी धीमी स्पन्दन में।

मूक हुआ जो शिशिर-निशा में
मेरे जीवन का संगीत,
मधु-प्रभात में भर देगा वह
अन्तहीन लय कण कण में।

पहिचान

किसी नक्षत्रलोक से टूट
विश्व के शतदल पर अज्ञात,
ढुलक जो पड़ी ओस की बूँद
तरल मोती सा ले मृदु गात;

नाम से जीवन से अनजान,
कहो क्या परिचय दे नादान।

किसी निर्मम कर का अघात
छेड़ता जब वीणा के तार,
अनिल के चल पंखों के साथ
दूर जो उड़ जाती झंकार;

जन्म ही उसे विरह की रात,
सुनावे क्या वह मिलनप्रभात।

चाह शैशव सा परिचयहीन
पलकदोलों में पलभर झूल,
कपोलों पर जो ढुल चुपचाप
गया कुम्हला आँखों का फूल;

एक ही आदि अन्त की साँस–
कहे वह क्या पिछला इतिहास!

मूक हो जाता वारिद घोष
जगा कर जब सारा संसार,
गूँजती टकराती असहाय
धरा से जो प्रतिध्वनि सुकुमार;

देश का जिसे न निज का भान,
बतावे क्या अपनी पहिचान!

सिन्धु को क्या परिचय दे देव!
बिगड़ते बनते वीचि-विलास;
क्षुद्र हैं मेरे बुदबुद प्राण
तुम्हीं में सृष्टि तुम्हीं में नाश!

मुझे क्यों देते हो अभिराम!
थाह पाने का दुस्कर काम?

जन्म ही जिसको हुआ वियोग
तुम्हारा ही तो हूँ उच्छवास;
चुरा लाया जो विश्व-समीर
वही पीड़ा की पहली सांस!

छोड़ क्यों देते बारम्बार,
मुझे तम से करने अभिसार?

छिपा है जननी का अस्तित्व
रुदन में शिशु के अर्थविहीन;
मिलेगा चित्रकार का ज्ञान
चित्र की ही जड़ता में लीन;

दृगों में छिपा अश्रु का हार,
सुभग है तेरा ही उपहार!

निभृत मिलन

सजनि कौन तम में परिचित सा, सुधि सा, छाया सा, आता?
सूने में सस्मित चितवन से जीवन-दीप जला जाता!

छू स्मृतियों के बाल जगाता,
मूक वेदनायें दुलराता,
हृतंत्री में स्वर भर जाता,
बन्द दृगों में, चूम सजल सपनों के चित्र बना जाता।

पलकों में भर नवल नेह-कन,
प्राणों में पीड़ा की कसकन,
स्वासों में आशा की कम्पन,
सजनि! मूक बालक मन को फिर आकुल क्रन्दन सिखलाता।

घन तम में सपने सा आकर,
अलि कुछ करुण स्वरों में गाकर,
किसी अपरिचित देश बुलाकर,
पथ-व्यय के हित अंचल में कुछ बांध अश्रु के कन जाता!
सजनि कौन तम में परिचित सा सुधि सा छाया सा आता?

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