रत्नसेन-सूली-खंड-पद्मावत -मलिक मुहम्मद जायसी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Malik Muhammad Jayasi

रत्नसेन-सूली-खंड-पद्मावत -मलिक मुहम्मद जायसी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Malik Muhammad Jayasi

बाँधि तपा आने जहँ सूरी। जुरे आई सब सिंघलपूरी॥
पहिले गुरुहि देइ कह आना। देखि रूप सब कोइ पछिताना॥
लोग कहहिं यह होइ न जोगी। राजकुँवर कोइ अहै बियोगी॥
काहुहि लागि भएउ है तपा। हिये सो माल, करहु मुख जपा॥
जस मारै कहँ बाजा तूरू। सूरी देखि हँसा मंसूरू॥
चमके दसन भएउ उजियारा। जो जहँ तहाँ बीजू अस मारा॥
जोगी केर करहु पै खोजू। मकु यह होइ न राजा भोजू॥

सब पूछहिं, कहु जोगी! जाति जनम औ नाँव।
जहाँ ठाँव रोवै कर हँसा सो कहु केहि भाव॥1॥

 

का पूछहु अब जाति हमारी । हम जोगी औ तपा भिखारी॥
जोगिहि कौन जाति, हो राजा। गारि न कोह, मारि नहिं लाजा॥
निलज भिखारि लाज जेइ खोई। तेहि के खोज परै जिनि कोई॥
जाकर जीउ मरै पर बसा। सूरि देखि सो कस नहिं हँसा? ॥
आजु नेह सौ होइ निबेरा। आजु पुहुमि तजि गगन बसेरा॥
आजु कया-पीजर-बँदि टूटा । आजुहिं प्रान-परेवा छूटा॥
आजु नेह सौं होइ निनारा। आजु प्रेम-सँग चला पियारा॥

आजु अवधि सिर पहुँची, किए जाहु मुख रात।
बेगि होहु मोहिं मारहु जिनि चालहु यह बात॥2॥

 

कहेन्हि सँवरु जेहि चाहसि सँवरा। हम तोहि करहिं केत कर भँवरा॥
कहेसि ओहि सँवरौं हरि फेरा। मुए जियत आहौं जेहि केरा॥
औ सँवरौं पदमावति रामा । यह जिउ नेवछावरि जेहि नामा॥
रकत क बूँद कया जस अहही। ‘पदमावति पदमावति’ कहही॥
रहै त बूँद बूँद महँ ठाऊँ। परै त सोई लेइ लेइ नाऊँ॥
रोंब रोंब तन तासौं ओधा। सूतहि सूत बेधि जिउ सोधा॥
हाड़हि हाड़ सबद सो होई। नस नस माँह उठै धुनि सोई॥

जागा बिरह तहाँ का गूद माँसु कै हान? ।
हौं पुनि साँचा होइ रहा ओहि के रूप समान॥3॥

 

जोगिहि जबहिं गाढ़ अस परा । महादेव कर आसन टरा ॥
वै हँसि पारबती सौं कहा । जानहुँ सूर गहन अस गहा ॥
आजु चढ़े गढ़ ऊपर तपा राजै गहा सूर तब छपा ॥
जग देखै गा कौतुक आजू । कीन्ह तपा मारै कहँ साजू ॥
पारबती सुनि पाँयन्ह परी । चलि, महेस! देखैं एहि घरी ॥
भेस भाँट भाँटिनि कर कीन्हा । औ हनुवंत भीर सँग लीन्हा ॥
आए गुपुत होइ देखन लागी । वह मूरति कस सती सभागी ॥

कटक असूझ देखि कै राजा गरब करेइ ।
देउ क दशा न देखै, दहुँ का कहँ जय देइ ॥4॥

 

आसन लेइ रहा होइ तपा । `पदमावति पदमावति’ जपा ॥
मन समाधि तासौं धुनि लागी । जेहि दरसन कारन बैरागी ॥
रहा समाइ रूप औ नाऊँ । और न सूझ बार जहँ जाऊँ ॥
औ महेस कहँ करौं अदेस । जेइ यह पंथ दीन्ह उपदेसू ॥
पारबती पुनि सत्य सराहा । औ फिरि मुख महेस कर चाहा ॥
हिय महेस जौं, कहै महेसी । कित सिर नावहिं ए परदेसी?॥
मरतहु लीन्ह तुम्हारहि नाऊँ । तुम्ह चित किए रहे एहि ठाऊँ ॥

मारत ही परदेसी, राखि लेहु एहि बीर ।
कोइ काहू कर नाही जो होइ चलै न तीर ॥5॥

 

लेइ सँदेस सुअटा गा तहाँ । सूरी देहिं रतन कहँ जहाँ ॥
लेइ सँदेस सुअटा गा तहाँ । सूरी देहिं रतन कहँ जहाँ ॥
देखि रतन हीरामन रोवा । राजा जिउ लोगन्ह हठि खोवा ॥
देखि रुदन हीरामन केरा । रोवहि सब, राजा मुख हेरा ॥
माँगहि सब बिधिना सौं रोई । कै उपकार छोड़ावै कोई ॥
कहि सदेस सब बिपति सुनाई । बिकल बहुत, किछु कहा न जाई ॥
काढि प्रान बैठी लेइ हाथा । मरै तौ मरौं, जिऔ एक साथा ॥
सुनि सँदेस राजा तब हँसा । प्रान प्रान घट घट कहँ बसा ॥

सुअटा भाँट दसौंधी, भए जिउ पर एक ठाँव ।
चलि सो जाइ अब देख तहँ जहँ बैठा रह राव ॥6॥

 

राजा रहा दिस्टि के औंधी । रहि न सका तब भाँट दसौधी ॥
कहेसि मेलि कै हाथ कटारी । पुरुष न आछे बैठ पेटारी ॥
कान्ह कोपि जब मारा कंसू । तब जाना पूरुष कै बंसू ॥
गंध्रबसेन जहाँ रिस= बाढ़ा । जाइ भाँट आगे भा ठाढ़ा ॥
बोल गंध्रबसेन रिसाई । कस जोगी, कस भाँट असाई ॥
ठाढ़ देख सव राजा राऊ । बाएँ हाथ दीन्ह बरम्हाऊ ॥
जोगी पानि, आगि तू राजा । आगिहि पानि जूझ नहिं छाजा ॥

आगि बुझाइ पानि सौं, जूझु न, राजा! बूझु ।
लीन्हे खप्पर बार तोहि, भिक्षा देहि, न झूझु ॥7॥

 

जोगि न होइ, आहि सो भोजू । जानहु भेद करहु सो खोजू ॥
भारत ओइ जूझ जौ ओधा । होहिं सहाय आइ सब जोधा ॥
महादेव रनघंट बजावा । सुनि कै सबद बरम्हा चलि आवा ॥
फनपति फन पतार सौं काढ़ा । अस्टौ कुरी नाग भए ठाढ़ा ॥
छप्पन कोटि बसंदर बरा । सवा लाख परबत फरहरा ॥
चढ़ै अत्र लै कृस्न मुरारी । इंद्रलोक सब लाग गोहारी ॥
तैंतिस कोटि देवता साजा । औ छानबे मेघदल गाजा ॥

नवौ नाथ चलि आवहिं औ चौरासी सिद्ध ।
आजु महाभारत चले, गगन गरुड़ औ गिद्ध ॥8॥

 

भइ अज्ञा को भाँट अभाऊ । बाएँ हाथ देइ बरम्हाऊ ॥
को जोगी अस नगरी मोरी । जो देइ सेंधि चढ़ै गड चोरी ॥
इंद्र डरै निति नावै माथा । जानत कृस्न सेस जेइ नाथा ॥
बरम्हा डरै चतुर-मुख जासू । औ पातार डरै बलि बासू ॥
मही हलै औ चलै सुमेरू । चाँद सूर औ गगन कुबेरू ॥
मेघ डरै बिजूरी जेहि दीठी । कूरुम डरै धरति जेहि पठी ॥
चहौं आजु माँगौं धरि केसा । और को कीट पतंग नरेसा?॥

बोला भाँट, नरेस सुन! गरब न छाजा जीउ ।
कुंभकरन कै खोपरी बूड़त बाँचा भीउँ ॥9॥

 

रावन गरब बिरोधा रामू । आही गरब भएउ संग्रामू ॥
तस रावन अस को बरिबंडा । जेहि दस सीस, बीस भुजदंडा ॥
सूरुज जेहि कै तपै रसोई । नितहिं बसंदर धोती धोई ॥
सूक सुमंता, ससि मसिआरा । पौन करै निति बार बोहारा ॥
जमहिं लाइ कै पाटी बाँधा । रहा न दूसर सपने काधा ॥
जो अस बज्र टरै नहिं टारा । सोऊ मुवा दुइ तपसी मारा ॥
नाती पूत कोटि दस अहा । रोवनहार न कोई रहा ॥

ओछ जानि कै काहुहि जिनि कोई गरब करेइ ।
ओछे पर जो देउ है जीति-पत्र तेइ देइ ॥10॥

 

अब जो भाँट उहाँ हुत आगे । बिनै उठा राजहि रिस लागे ॥
भाँट अहै संकर कै कला । राजा सहुँ राखैं अरगला ॥
भाँट मीचु पै आपु न दीसा । ता कहँ कौन करै अस रीसा?॥
भएउ रजायसु गंध्रबसेनी । काहे मीचु के चढ़ै नसेनी? ॥
कहा आनि बानि अस पढ़ै?। करसि न बुद्धि भेंट जेहि कढ़ै ॥
जाति भाँत कित औगुन लावसि । बाएँ हाथ राज बरम्हावसि ॥
भाँट नाँव का मारौं जीवा?। अबहूँ बोल नाइ कै गीवा ॥

तूँ रे भाँट, ए जोगी, तोहि एहि काहे क संग? ।
काह छरे अस पावा, काह भएउ चित=भंग ॥11॥

 

जौं सत पूछसि गंध्रब राजा । सत पै कहौं परै नहिं गाजा ॥
भाँटहि काह मीचु सौं डरना । हाथ कटार, पेट हनि मरना ॥
जंबूदीप चित्तउर देसा । चित्रसेन बड़ तहाँ नरेसा ॥
रतनसेन यह ताकर बेटा । कुल चौहान जाइ नहिं मेटा ॥
खाँडै अचल सुमेरु पहारा । टरै न जौं लागै संसारा ॥
दान-सुमेरु देत नहिं खाँगा । जो ओहि माँग न औरहि माँगा ॥
दाहिन हाथ उठाएउँ ताही । और को अस बरम्हावौ जाही ॥

नाँव महापातर मोहिं, तेहिक भिखारी ढीठ ।
जौं खरि बात कहे रिस लागै, कहै बसीठ ॥12॥

 

ततखन पुनि महेस मन लाजा । भाँट-करा होइ बिनवा राजा ॥
गंध्रबसेन! तुँ राजा महा । हौं महेस-मूरति, सुनु कहा ॥
जौ पै बात होइ भलि आगे । कहा चहिय, का भा रिस लागे ॥
राजकुँवर यह, होहि न जोगी । सुनि पदमावति भएउ बियोगी ॥
जंबूदीप राजघर बेटा । जो है लिखा सो जाइ न मेटा ॥
तुम्हरहि सुआ जाइ ओहि आना । औ जेहि कर,बर कै तेइ माना ॥
पुनि यह बात सुनी सिव-लोका । करसि बियाह धरम है तोका ॥

माँगै भीख खपर लेइ, मुए न छाँड़ै बार ।
बूझहु, कनक-कचोरी भीखि देहु, नहिं मार ॥13॥

 

ओहट होहु रे भाँट भिखारी । का तू मोहिं देहि असि गारी ॥
को मोहिं जोग जगत होइ पारा । जा सहुँ हेरौं जाइ पतारा ॥
जोगी जती आव जो कोई । सुनतहि त्रासमान भा सोई ॥
भीखि लेहिं फिरि मागहिं आगे । ए सब रैनि रहे गढ़ लागे ॥
जस हींछा, चाहौं तिन्ह दीन्हा । नाहिं बेधि सूरी जिउ लीन्हा ॥
जेहि अस साध होइ जिउ खोवा । सो पतंग दीपक अस रोवा ॥
सुर, नर,मुनि सब गंध्रब देवा । तेहि को गनै? करहि निति सेवा ॥

मोसौं को सरवरि करै? सुनु, रे झूठे भाँट!
छार होइ जौ चालौं निज हस्तिन कर ठाट ॥14॥

 

जोगी घिरि मेले सब पाछे । उरए माल आए रन काछे ॥
मंत्रिन्ह कहा, सुनहु हो राजा । देखहु अब जोगिन्ह कर काजा ॥
हम जो कहा तुम्ह करहु न जूझु । होत आव दर जगत असूझु ॥
खिन इक महँ झुरमुट होइ बीता । दर महँ चढ़ि जो रहै सो जीता ॥
कै धीरज राजा तब कोपा । अंगद आइ पाँव रन रोपा ॥
हस्ति पाँच जो अगमन धाए । तिन्ह अंगद धरि सूड फिराए ॥
दीन्ह उड़ाइ सरग कहँ गए । लौटि न फिरै, तहँहि के भए ॥

देखत रहे अचंभौ जोगी, हस्ती बहुरि न आय ।
जोगिन्ह कर अस जूझब, भूमि न लागत पाय ॥15॥

 

कहहिं बात, जोगी अब आए । खिनक माहँ चाहत हैं भाए ॥
जौ लहि धावहिं अस कै खेलहु । हस्तिन केर जूह सब पेलहु ॥
जस गज पेलि होहिं रन आगे । तस बगमेल करहु सँग लागे ॥
हस्ति क जूह आय अगसारी । हनुवँत तबै लँगूर पसारी ॥
जैसे सेन बीच रन आई । सबै लपेटि लँगूर चलाई ॥
बहुतक टूटि भए नौ खंडा । बहुतक जाइ परे बरम्हंडा ॥
बहुतक भँवत सोइ अँतरीखा । रहे जो लाख भए ते लीखा ॥

बहुतक परे समुद महँ, परत न पावा खोज ।
जहाँ गरब तहँ पीरा, जहाँ हँसी तहँ रोज ॥16॥

 

पुनि आगे का देखै राजा । ईसर केर घंट रन बाजा ॥
सुना संख जो बिस्नू पूरा । आगे हनुवँत केर लँगूरा ॥
लीन्हे फिरहिं लोक बरम्हंडा । सरग पतार लाइ मृदमंडा ॥
बलि, बासुकि औ इंद्र नरिंदू । राहु, नखत, सूरुज औ चंदू ॥
जावत दानव राच्छस पुरे । आठौं बज्र आइ रन जुरे ॥
जेहि कर गरब करत हुत राजा । सो सब फिरि बैरी होइ साजा ॥
जहवाँ महादेव रन खड़ा । सीस नाइ पायँन्ह परा ॥

केहि कारन रिस कीजिए? हौं सेवक औ चेर ।
जेहि चाहिए तेहि दीजिय, बारि गोसाईं केर ॥17॥

 

पुनिं महेस अब कीन्ह बसीठी । पहिले करुइ, सोइ अब मीठी ॥
तूँ गंध्रब राजा जग पूजा । गुन चौदह, सिख देइ को दूजा?॥
हीरामन जो तुम्हार परेवा । गा चितउर औ कीन्हेसि सेवा ॥
तेहि बोलाइ पूछहु वह देसू । दहुँ जोगी, की तहाँ नरेसू ॥
हमरे कहत न जौं तुम्ह मानहु । जो वह कहै सोइ परवाँनहु ॥
जहाँ बारि, बर आवा ओका । करहिं बियाह धरम बड़ तोका ॥
जो पहिले मन मानि न काँधे । परखै रतन गाँठि तब बाँधै ॥

रतन छपाए ना छपै, पारिख होइ सो परीख ।
घालि कसौटी दीजिए कनक-कचोरी भीख ॥18॥

 

राजे जब हीरामन सुना । गएउ रोस, हिरदय महँ गुना ॥
अज्ञा भई बोलावहु सोई । पंडित हुँते धोख नहिं होई ॥
एकहिं कहत सहस्त्र धाए । हीरामनहिं बेगि लेइ आए ॥
खोला आगे आनि मँजूसा । मिला निकसि बहु दिनकर रूसा ॥
अस्तुति करत मिला बहु भाँती । राजै सुना हिये भइ साँती ॥
जानहुँ जरत आगि जल परा । होइ फुलवार रहस हिय भरा ॥
राजै पुनि पूछी हँसि बाता । कस तन पियर, भएउ मुख राता ॥

चतुर वेद तुम पंडित, पढ़े शास्त्र औ बेद ।
कहा चढ़ाएहु जोगिन्ह, आइ कीन्ह गढ़ भेद ॥19॥

 

हीरामन रसना रस खोला । दै असीस, कै अस्तुति बोला ॥
इंद्रराज राजेसर महा । सुनि होइ रिस, कछु जाइ न कहा ॥
पै जो बात होइ भलि आगे । सेवक निडर कहै रिस लागे ॥
सुवा सुफल अमृत पै खोजा । होहु न राजा बिक्रम भोजा ॥
हौं सेवक, तुम आदि गोसाईं । सेवा करौं जिऔं जब ताईं ॥
जेइ जिउ दीन्ह देखावा देसू । सो पै जिउ महँ बसै, नरेसू! ॥
जो ओहि सँवरै `एकै तुही’ । सोई पंखि जगत रतमुहीं ॥

नैन बैन औ सरवन सब ही तोर प्रसाद ।
सेवा मोरि इहै निति बोलौं आसिरबाद ॥20॥

 

जो अस सेवक जेइ तप कसा । तेहि क जीभ पै अमृत बसा ॥
तेहि सेवक के करमहिं दोषू । सेवा करत करै पति रौषू ॥
औ जेहि दोष निदोषहि लागा । सेवक डरा, जीउ लेइ भागा ॥
जो पंछी कहवाँ थिर रहना । ताकै जहाँ जाइ भए डहना ॥
सप्त दीप फिरि देखेंउँ, राजा । जंबूदीप जाइ तब बाजा ॥
तहँ चितउरगढ़ देखेउँ ऊँचा । ऊँच राज सरि तोहि पहूँचा ॥
रतनसेन यह तहाँ नरेसू । एहि आनेउँ जोगी के भेसू ॥

सुआ सुफल लेइ आएउँ, तेहि गुन तें मुख रात ।
कया पीत सो तेहि डर, सँवरौं विक्रम बात ॥21॥

 

पहिले भएउ भाँट सत भाखी । पुनि बोला हीरामन साखी ॥
राजहि भा निसचय, मन माना । बाँधा रतन छोरि कै आना ॥
कुल पूछा चौहान कुलीना । रतन न बाँधे होइ मलीना ॥
हीरा दसन पान-रँग पाके । बिहँसत सबै बीजु बर ताके ।
मुद्रा स्रवन विनय सौं चापा । राजपना उघरा सब झाँपा ॥
आना काटर एक तुखारू । कहा सो फेरौ, भा असवारू ॥
फेरा तुरय, छतीसो कुरी । सबै सराहा सिंघलपुरी ॥

कुँवर बतीसौ लच्छना, सहस-किरिन जस भान ।
काह कसौटी कसिए? कंचन बारह-बान ॥22॥

देखि कुँवर बर कंचन जोगू । `अस्ति अस्ति’ बोला सब लोगू ॥
मिला सो बंश अंस उजियारा । भा बरोक तब तिलक सँवारा ॥
अनिरुध कहँ जो लिखा जयमारा । को मेटै? बानासुर हारा ॥
आजु मिली अनिरुध कहँ ऊखा । देव अनंद, दैत सिर दूखा ॥
सरग सूर, भुइ सरवर केवा । बनखंड भँवर होइ रसलेवा ॥
पच्छिउँ कर बर पुरुब क बारी । जोरी लिखी न होइ निनारी ॥
मानुष साज लाख मन साजा । होइ सोइ जो बिधि उपराजा ॥

गए जो बाजन बाजत जिन्ह मारन रन माहिं ।
फिर बाजन तेइ बाजे मंगलचारि उनाहिं ॥23॥

 

बोल गोसाईं कर मैं माना । काह सो जुगुति उतर कहँ आना?॥
माना बोल, हरष जिउ बाढ़ा । औ बरोक भा, टीका काढ़ा ॥
दूवौ मिले, मनावा भला । सुपुरुष आपु कहँ चला ॥
लीन्ह उतारि जाहि हित जोगू । जो तप करे सो पावै भोगू ॥
वह मन चित जो एकै अहा । मारै लीन्ह न दूसर कहा ॥
जो अस कोई जिउ पर छेवा । देवता आइ करहिं निति सेवा ॥
दिन दस जीवन जो दुख देखा । भा जुग जुग सुख, जाइ न लेखा ॥

रतनसेन सँग बरनौ पदमावति क बियाह ॥
मंदिर बेगि सँवारा, मादर तूर उछाह ॥24॥

 

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