रत्नसेन-देवपाल-युद्ध-खंड-पद्मावत -मलिक मुहम्मद जायसी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Malik Muhammad Jayasi

रत्नसेन-देवपाल-युद्ध-खंड-पद्मावत -मलिक मुहम्मद जायसी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Malik Muhammad Jayasi

सुनि देवपाल राय कर चालू । राजहि कठिन परा हिय सालू ॥
दादुर कतहुँ कँवल कहँ पेखा । गादुर मुख न सूर कर देखा ॥
अपने रँग जस नाच मयूरू । तेहि सरि साध करै तमचूरू ॥
जों लगि आइ तुरुक गढ़ बाजा । तौ लगि धरि आनौं तौ राजा ॥
नींद न लीन्ह, रैनि सब जागा । होत बिहान जाइ गढ़ लागा ॥
कुंभलनेर अगम गड़ बाँका । बिषम पंथ चढ़ि जाइ न झाँका ॥
राजहि तहाँ गएउ लेइ कालू । होइ सामुहँ रोपा देवपालू ॥

दुवौ अनी सनमुख भइँ, लोहा भएउ असूझ ।
सत्र जूझि तब नेवरै, एक दुवौ महँ जूझ ॥1॥

 

जौ देवपाल राव रन गाजा । मोहि तोहि जूझ एकौझा, राजा!॥
मेलेसि साँग आइ बिष-भरी । मेटि न जाइ काल कै घरी ॥
आइ नाभि पर साँग बईठी । नाभि बेधि निकसी सो पीठी ॥
चला मारि,तब राजै मारा । टूट कंध, धड़ भएउ निनारा ॥
सीस काटि कै बैरी बाँधा । पावा दाँव बैर जस साधा ॥
जियत फिरा आएउ बल-भरा । माँझ बाट होइ लोहै धरा ॥
कारी घाव जाइ नहिं डोला । रही जीभ जम गही, को बोला?॥

सुधि बुधि तौ सब बिसरी, भार परा मझ बाट ।
हस्ति घोर को काकर? घर आनी गइ खाट ॥2॥

 

 

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