रचना प्रक्रिया-अमीरी रेखा_कविता संग्रह-कुमार अंबुज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kumar Ambuj

रचना प्रक्रिया-अमीरी रेखा_कविता संग्रह-कुमार अंबुज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kumar Ambuj

 

अमावस्या के दिन सुबह से ही तारों का वैभव दिखता है
जैसे पूर्णिमा का चाँद दिखना शुरू होता है द्वादशी से ही

दिखने लगती हैं ओट में छिपी चीजें
जो रोज़ दिखते हुए भी नहीं दिखतीं
जैसे एक आदमी और दो बच्चों की आतिशबाज़ी की
रोशनी में दुबकी दिखती है एक स्त्री की निष्प्रभता
अंधे कुएँ में की किसी धातु से परावर्तित होती है
प्रकाश की रेखा

वहीं मिलता है भाषा का फलदार वृक्ष
जिसकी डालियाँ छूने भर से झुकने को आतुर
रसायनों भरे प्रदीप्त क्षणों में से उठती है आवाजें:
अगर हमारे जीवन में जोखिम नहीं
तो तय है वह हमारे बच्चों के जीवन में होगा
सिर्फ संपत्तियाँ उत्तराधिकार में नहीं मिलेंगी
गलतियों का हिसाब भी हिस्से में आयेगा

फिर दिखाई देता है खोने के लिए
एक शांत किस्म का व्यक्तिगत जीवन
जिसे इस जगह तक भी कोई इच्छा, एक प्रेम,
एक दया, एक हँसी
और एक छोटी-सी ज़िद ले आई है खींचकर

इसी जीवन में ट्रक की तेज़ी से गुजरते हैं हादसे
जिनसे ख़ाली होती हुई जगह को
उसी वेग से भरती जाती है
पीछे से दौड़कर आती जीवन की हवा।

 

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