रंगोली में रंग भरते बच्चे-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

रंगोली में रंग भरते बच्चे-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

रंगोली में रंग भरते बच्चे
मुझे बहुत अच्छे लगते हैं।
रब्ब जैसे सर्जक
बदरंग लकीरों में जान डालते
जीवन धड़काते
देखा देखी साथ साथ
गीत गाते।
रंगों को धड़कन सिखलाते।

रंगोली में रंग भरते
बच्चों को देखते
नन्ही नन्ही शरारतें
करता रब्ब दिखेगा
मासूम-सा गोल मटोल आँखों वाला
बेपरवाह, निश्छल, निष्कपट, निर्विकार
सिर से पैरों तक हरकत
इसी से बरकत।

मैं भी नन्हा था तो रब्ब होता था
रंगोली में रंग तो नहीं भरा
पर सपने कुछ ऐसे-से ही थे
चिकनी मिट्टी से खेलना
घुघ्घू घोडे़ बनाना
ज़ोर-ज़ोर से धरती पर पटकाता
पटाके डालता
फिर उसी मिट्टी को और गूँधता
बैलों की जोड़ी बनाता
गले में जुआठा डालता
पीछे दोशाखा टहनी का
हल नाधता
बीज बोता नरकुल के डंठल से।
पाटा देता
और बोई फसल के उगने की प्रतीक्षा करता।

अब मैं मिट्टी में नहीं
कोरे पन्ने पर सपने बोता हूँ
उम्र में बड़ा होकर भी
वैसे का वैसा हूँ
तो ही सपने उगने की प्रतीक्षा करता हूँ।
कोरे पन्ने के ख़िलाफ़
युद्ध न सही
तैयारी तो करता हूँ।

 

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