योग चिंतामणि-भक्त रामानन्द जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Ramanand Ji

योग चिंतामणि-भक्त रामानन्द जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Ramanand Ji

ॐ अकट बिकट रे भाई । काया (गढ़) चढा न जाई ॥
पछिम (दि) शा की घाटी। फौज खड़ी है ठाढी ॥१॥

जहाँ नाद-बिंदु की हाथी । सतगुर ले चल साथी॥
सतगुर साह बिराजै। नौबत नाम की बाजै ॥२॥

जहाँ अष्ट दल कमल फूला । हंस सरोवर में भूला ॥
जहाँ राग रंग होय षासे । जहाँ है हंस के बासे ॥३॥

शब्द को सीखले शब्द को बूझले शब्द से शब्द पहिचान भाई ।
शब्द तो हृदय बसे शब्द तो नयनों बसे शब्द की महिमा चार वेद गाई ॥४॥

शब्द तो आकाश बसे शब्द तो पाताल बसे शब्द तो पिंड ब्रह्मांड छाई ।
आप में देख ले सकल में पेषले आप मध्ये विचार भाई ॥५॥

कह रामानंद सतगुर दया करि मिलिया सत्य का शब्द सुन भाई ॥
……. फकीरी अदल बादसाही ॥६॥

संतो बन्दगी दीदार । सहज उतरो सागर पार ॥
सोहं शब्दै सों कर प्रीत । अनुभव अषंड घर जीत ॥७॥

अब उलटा चढ़ना दूर । जहाँ नगर बसता है पूर ॥
तन कर फिकिर कर भाई । जिसमें राम रोसनाई ॥८॥

सुरत नगर का कर सयल । जिसमें आत्मा का महल ।
इंद्रिया सिंधु मूल मिलियां । जिस पर रषना बाँवा पांव ॥९॥

दाहिने को मध्य पर धरनां । आसन अमर घर करनां ॥
द्वादश पव (न) भर पीता । उलट घर शीश को चढ़नां ॥१०॥

दो नैना कर बांन । भौंह उलटा कस कवांन ॥
त्रिवेनी कर असनांन । तेरा मेट जाय आवा जांन ॥११॥

बाजा गैब का बाजे । बोली सिंधु में राजे ॥
…… लगी है गैब के बाजा ॥१२॥

संतो बंदे सबदा पार । दोहे सरवर दोहे पहार ॥
जहाँ षरे कुदरथ को झार । लगी है नौ लष हार ॥१३॥

शंकला करण मूल । जडिया कटे तो देषना मत फूल ।
माया ब्रह्म की फांसी । परी है प्रेम की फांसी ॥१४॥

बाजन बिना तम तूर । सहजे ऊगे पच्छि (म) सूर ।
भवर है सुगंध का प्यासा । किया है कमल का वासा ॥१५॥

इंद्रिया आराम का दीन्हा जिसका चोलना है लाल ।
….. .उनमनी भरे जदद मसाल ॥१६॥

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