ये हुस्न है आह या क़यामत कि इक भभूका भभक रहा है -ग़ज़लें-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

ये हुस्न है आह या क़यामत कि इक भभूका भभक रहा है -ग़ज़लें-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

 

ये हुस्न है आह या क़यामत कि इक भभूका भभक रहा है
फ़ल्क पे सूरज भी थरथरा कर मुँह उस का हैरत से तक रहा है

वो माथा ऐसा कि चाँद निखरे फिर उस के ऊपर वो बाल बिखरे
दिल उस के देखे से क्यूँ न बिखरे कि मिस्ल-ए-सूरज चमक रहा है

वो चीन ख़ुद-रौ कटीले अबरू वो चश्म जादू निगाहें आहू
वो पलकें कज-ख़ू कि जिन का हर मू जिगर के अंदर खटक रहा है

ग़ज़ब वो चंचल की शोख-बीनी फिर उस पे नथुनों की नुक्ता-चीनी
फिर उस पे नथ की वो हम-नशीनी फिर उस पे मोती फड़क रहा है

लब ओ दहाँ भी वो नर्म-ओ-नाज़ुक मिसी ओ पाँ भी वो क़हर-ओ-आफ़त
सुख़न भी करने की वो लताफ़त कि गोया मोती टपक रहा है

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