ये हरिण सी बदलियाँ :-बनपाखी सुनो -नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta

ये हरिण सी बदलियाँ :-बनपाखी सुनो -नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta

 

थीं घिरीं उस साँझ भी कबरी हरिण सी बदलियाँ!!

आज तक हैं कह रहे
ये घाट के पत्थर,
लहर जल, ककड़ियों के खेत–
झुरमुटों पर मृगनयन-सी तितलियाँ उड़ती हुई,
साँझिल हवा–सब कह रही हैं।
पकड़ने सूर्यास्त बढ़ते चरण चिह्नों को हमारे
यह समेटे आज तक लेटी हुई है
गोमती की रेत।
दूर उस आकाश के पीपल तले
हवाओं के नील डैने थे खुले,
छू तुम्हारा लाल अंचल मृदु झकोरे
संग चलने के लिए करते सदा थे मृग-निहोरे।
पन्थ की पसली सरीखी यह उभरती जड़
जहाँ हम बैठते थे,
कह रही है–
हम मिले थे, साँझ थी, तट था यही, थीं कदलियाँ!!
थीं घिरीं उस साँझ भी कबरी हरिण सी बदलियाँ!!

वर्ष बीते,
हम समय की घाटियाँ उतरे
बहुत उतरे–
दूब भी सूखी,
पठारों भरे तट छितरे–
अर्द्ध डूबा बुर्ज धँसता गया होगा और भी गहरे।
मैं विरह के शाप का पहने मुकुट
सहसा गया उस रात,
था चँदीले वर्क में लिपटा पड़ा
तन्वंगिनी उस गोमती का गात,
कुहर भीगे गाछ–
रस्सियों में नाव बाँधे थे पड़े चुपचाप लेटे पाट–
पंख तौले पत्तियाँ झरनी शुरू थीं–
किनारों की जलभरी जड़खाइयों में
उनींदी लहरें भरी थीं–
फुनगियों पर कपोती सी चाँदनी अलसा रही थी–
एक गहरी शान्ति,
नीली शान्ति–
तुम्हारी उर-झील में जो समाहित हो न पायी
जल रही है आज तक मेरे हृदय में
वही पहली क्रान्ति!!
मेरी भ्रान्ति!!
कहो तो स्वीकार लूँ अपनी पराजय,
क्योंकि,
सत्य है अब–
हम अलग हैं, रात है,
उस बाँध पर बंसी लगाये एक मछुआ गा रहा है कजलियाँ!!
थी घिरीं उस साँझ भी कबरी हरिण सी बदलियाँ!!

 

This Post Has One Comment

Leave a Reply