ये शक्ल कहीं देखी है -इसलिए बौड़म जी इसलिए-अशोक चक्रधर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ashok Chakradhar,

ये शक्ल कहीं देखी है -इसलिए बौड़म जी इसलिए-अशोक चक्रधर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ashok Chakradhar,

ये शक्ल कहीं और देखी है!
(कई बार दर्शक भूल जाते हैं कि कहां मिले थे)

टेलीविज़न पर आना कोई शेखी है!
लोग राह चलते कहते हैं—
ये शक्ल कहीं और देखी है।

प्यार उमड़ता है ऐसे बंदों पर,
मैं उन्हें कैसे समझाऊं
शक्ल कहीं और कैसे दिख सकती है
ये तो शुरू से टिकी है इन्हीं दो कंधों पर।

लोग हाथ मिलाते हुए चहककर मिलते हैं,
गले लगते हुए गहक कर मिलते हैं।
मिलते हैं तो ख़ुशी से फूल जाते हैं,
पर कहां मिले थे ये भूल जाते हैं।
याद नहीं आता तो अनुमान लगाते हैं—
आपकी जीके में साडि़यों की दुकान है न?
हमारे मौहल्ले में ही आपका मकान है न?
आपके स्टोर से तो हम बुक्स लाते हैं।
आपके यहीं तो हम कुर्ते सिलवाते हैं!
आप हमारे साले के रिश्ते में भाई हैं,
आप वकील हैं न,
आपके साढ़ू साब नागपुर में हलवाई हैं।
आप तीसहजारी में टाइपिस्ट हैं न,
आप मराठी के जर्नलिस्ट हैं न!
अजी आपके यहां हमने कार्ड छपवाए हैं।
आप तो बंकरडूमा में हमारे घर आए हैं!

मैं शपथपूर्वक कहता हूं
कि मुझे नहीं मालूम कहां है बंकरडूमा,
उसके आसपास की गलियों में भी
मैं कभी नहीं घूमा।
माफ़ कीजिएगा सिर्फ़ इतना बताता हूं,
टीवी की छोटी सी खिडक़ी से
बिना पूछे आपके घर में घुस जाता हूं।
घबराइए मत
आदमी सीधा सच्चा हूं,
दो हफ़्ते पहले
पूरे इकसठ साल का हो गया
पर आपका बच्चा हूं।

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