ये दिल और उनकी, निगाहों के साये-गीत जाँ निसार अख़्तर-जाँ निसार अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaan Nisar Akhtar

ये दिल और उनकी, निगाहों के साये-गीत जाँ निसार अख़्तर-जाँ निसार अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaan Nisar Akhtar

ये दिल और उनकी, निगाहों के साये
मुझे घेर लेते, हैं बाहों के साये

पहाड़ों को चंचल, किरन चूमती है
हवा हर नदी का बदन चूमती है
यहाँ से वहाँ तक, हैं चाहों के साये
ये दिल और उनकी निगाहों के साये …

लिपटते ये पेड़ों से, बादल घनेरे
ये पल पल उजाले, ये पल पल अंधेरे
बहुत ठंडे ठंडे, हैं राहों के साये
ये दिल और उनकी निगाहों के साये …

धड़कते हैं दिल कितनी, आज़ादियों से
बहुत मिलते जुलते, हैं इन वादियों से
मुहब्बत की रंगीं पनाहों के साये
ये दिल और उनकी निगाहों के साये …

(प्रेम पर्बत)

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