ये छपके का जो बाला कान में अब तुम ने डाला है-ग़ज़लें-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

ये छपके का जो बाला कान में अब तुम ने डाला है-ग़ज़लें-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

ये छपके का जो बाला कान में अब तुम ने डाला है
इसी बाले की दौलत से तुम्हारा बोल-बाला है

नज़ाकत सर से पाँव तक पड़ी कुर्बान होती है
इलाही इस बदन को तू ने किस साँचे में ढाला है

ये दिल क्यूँकर निगह से उस की छिदत्ते हैं मैं हैराँ हूँ
न ख़ंजर है न नश्तर है न जमधर है न भाला है

बलाएँ नाग काले नागिनें और साँप के बच्चे
ख़ुदा जाने कि उस जूड़े में क्या क्या बाँध डाला है

‘नज़ीर’ इक और लिख ऐसी ग़ज़ल जो सुन के जी ख़ुश हो
अरी इस ढब की बातों ने तो दिल में शोर डाला है

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