युद्ध, केवल युद्ध-वतन तुम्हारे साथ है-शंकर लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankar Lal Dwivedi 

युद्ध, केवल युद्ध-वतन तुम्हारे साथ है-शंकर लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankar Lal Dwivedi

 

विहँस आहुतियाँ जिन्होंने दीं वही-
आज धूमाकुल नयन भरने लगे।
अग्नि का सत्कार जो करते रहे-
आँसुओं का आचमन करने लगे।।

नग्न-तन पर कीटवत्, धिक् राजमद,
देश के सम्मान पर थोपा गया।
काट कर बलिदान का सूरजमुखी,
संधि का, कटु कनक-तरु रोपा गया।।

विकसने पर फूल, खादी के सदृश,
शुभ्र होंगे, मानता हूँ मैं इसे।
किन्तु आस्वादन, जनक विक्षिप्ति का-
और फल के शूल, प्रिय होंगे किसे?

संधि थी या दुरभि-संधि, पता नहीं?
तुम शिखाएँ बाँध कर चलते बने।
ठीक है, विस्तार तो कम हो गया,
उग रहे हैं कुछ प्रबल अंकुर घने।।

सूचिकाएँ देह में चुभती रहें,
किन्तु पीड़ा-भास प्राणों को न हो।
शत्रु सीमा-क्षेत्र हथियाता रहे-
और ‘जन-गण-मन’ अधीराहत न हो।।

वैधता अपनी स्वयं ही आँक लो,
आत्म-हुत, यजमान के हस्ताक्षर!
आँख में पानी भरो, लो देख लो-
मोर्चे फिर जम गए आदर्श पर।।

‘युद्धाय कृत निश्चयः’-इस श्लोक का,
लोग तो अनुवाद करने लग गए।
अक्षरों को नोंचने वाले- ‘अधम’,
एक हम हैं, स्वप्न देखा, जग गए।।

धूप को बदनाम करते यात्रियो!
ये तुम्हारे आचरण से खिन्न हैं।
मिट नहीं पाए, इसी पथ पर अभी-
देखते हो, सैकड़ों पद-चिह्न हैं।।

ईर्ष्या जनती ललौंहे द्वेष को,
देखते हैं द्वन्द्व कुछ, इस मोद में-
कुछ कुतूहल को पिलाते हैं सुधा,
कौन है, जो आग को ले गोद में?

शीत से सब अंग हो जाएँ शिथिल,
रक्त का संचार जब अवरुद्ध हो।
श्वास लें, तो प्राण अकुलाने लगें-
हंस जैसे हो गया शर-विद्ध हो।।

आग केवल आग, थोड़ी या बहुत-
चाहिए तन को तपाने के लिए।
युद्ध, केवल युद्ध है संजीवनी,
राष्ट्र का गौरव बचाने के लिए।।

सूर्य तो है- योजनों आकाश पर,
और ढलने में प्रभूत विलम्ब है।
यह तुम्हारे ही घृणित दुष्कृत्य के-
स्याह जल में, सूर्य का प्रतिबिंब है।।

चूड़ियों को तोड़ कर उसने अभी-
श्वेत वस्त्रों से ढँका था- देह को।
ढीठ! दर्पण सामने क्यों रख दिया?
मिल गया यह तो निमंत्रण-नेह को।।

राखियों के पर्व पर सौदागरो!
द्वार से सिमटी खड़ी, अपलक नयन,
वेदना की थाह तो मापी नहीं;
पूछ बैठे- ‘राखियाँ लोगी बहिन!’?

काँपता आँचल हथेली में कसा,
हिलकियों को थामता ही रह गया।
हूकता अवसाद, बादल सा घुमड़-
अश्रु बनकर, म्लान मुख पर बह गया।।

लड़खड़ाते पाँव- लौटे, जड़ हुए,
ओठ अभ्यासी पुकारे- ‘ओ बिरन’!
बाँह बिखरीं शून्य आँगन में, जहाँ
झुर्रियों वाली उमर ने दी शरण।।

और तुम टूटी पड़ीं सब चूड़ियाँ-
बीनते, पथ पर उधर चलने लगे-
मोल ले कोई जहाँ, कुछ दे तुम्हें,
ये गलें, तो और कुछ ढलने लगे।।

नीतियों का मान रखने के लिए-
कर दिया अपमान उस इतिहास का।
रीतियों ने भोजपत्रों पर जिसे-
रक्त से लिख-लिख, युगों संचित रखा।।

जन्म-दिन पर नीति के, सब रीतियाँ,
दे गईं आशीष- चिर्-जीवन जिए।
अर्थ इसका यह न था- कि पिशाचिनी-
रक्त उनका आँजुरी भर-भर पिए।।

रक्त? हाँ, यह रीतियों का रक्त है,
माँग में भरती जिसे हठवादिता।
तनिक सा संकेत दे, तो आँख में-
धूल को भी आँज लेती वीरता।।

अंक में भर, हाथ में आँचल लिए,
पौंछती थी नेह से मुख-भाल को।
चूम लेती थी- पुलक जलते अधर,
अनमना सा देख, माँ जिस लाल को।।

‘राम-लक्ष्मण’, ‘भीम-अर्जुन’ की कथा-
माँ अगर सोते समय कहती नहीं।
तो उतर पर्यंक से, कुछ कुनमुना,
धूल में जो लेट जाता था वहीँ-।।

लाल दे कर लाख के घर में जमे-
अंध बौनो! चेतना से काम लो।
रक्त की उष्मा जिलाए है जिन्हें-
उन कपोतों का कहा तो मान लो।।

वन्य जीवों को हृदय का स्नेह दो।
यह तपोवन-वासियों का धर्म है।
हिंस्र-पशु बाधा न डालें शांति में,
इसलिए प्रतिबंध ही सत्कर्म है।।

आग, दहकी आग ही उपयुक्त है-
हिंस्र-पशुओं को डराने के लिए।
युद्ध, केवल युद्ध क्षमतावान है-
शांति का दीपक जलाने के लिए।।

-३ नवम्बर, १९६६

 

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