युद्ध का आखिरी दिन नहीं होता-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

युद्ध का आखिरी दिन नहीं होता-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

दशहरा युद्ध का
आखिरी दिन नहीं
दसवां दिन होता है।

युद्ध तो जारी रखना पड़ता।
सबसे पहले
अपने ख़िलाफ़
जिसमें सदियों से
रावण डेरा डाले बैठा है।
तृष्णा का स्वर्णमृग छोड़ देता है
रोज़ सवेरे
हमें छलावे में लेता है।

सादगी की सीता मैया को
रोज़ छलता है
फिर भी धर्मी कहलाता है

सोने की लंका में बसते
वह जान गया है कूटनीति।
हर व्यक्ति का मूल्य लगाता है।
अपने दरबार में नचाता है।
औकात मुताबिक
कभी किसी को, कभी किसी को
बांदर बनाता है
बराबर की कुर्सी पर बिठाता है।
भ्रम डालता है।
सेठे की तीरों से
कहाँ मरता है रावण?
जैड प्लस सुरक्षा छत्रधारी।
अबे तबे बोलता है
घर नहीं देखता,
बाहर नहीं देखता
अग्नि अंगार मुँह से निकालता
हमारे पुत्र पुत्रियों को
युद्ध के लिए ईंधन की जगह बरतता।
दशहरा युद्ध का आखिरी दिन नहीं
दसवां दिन होता है।

रावण को
तीन सौ पैंसठ दिनों में से
सिर्फ दस दिन ही
दुश्मन न समझना
पल पल जानना और पहचानना।
कैसे चूस लेता है हमारा रक़्त
सोते सोते
घोल कर पी जाता है
हमारा स्वाभिमान आत्मगौरव और
और बहुत कुछ।

आर्य द्रविड़ो को
धड़ों में बाँट कर
अपना हित साधता है
युद्ध वाले नुक़्ते भी
ऐसे समझाता है।
बातों का बादशाह
पास से कुछ न लगाता है।

रक्षक बन कर जेबें खँगालता है।
वतनपरस्ती के भ्रमजाल में
भोली मछलियाँ फँसाता है
तर्ज़ तो कोई और बनाता है
पर धुन का बहुत पक्का है
हर समय एक ही गीत अलापता
कुर्सी राग गाता है।

पूरा समझौतापरस्त है
भगवान को भी
बातों में भरमाता है
ऐसा उलझाता है
पत्थर बना कर उसको
मूर्ति सा सजाता है।
बगुला भगत पूरा
मनचाहा फल पाता है।

दशहरा युद्ध का आखिरी दिन नहीं
दसवां दिन होता है।

 

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