युग चरण -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Yug Charan Part 2

युग चरण  -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Yug Charan Part 2

आ गये ऋतुराज

आ गये ऋतुराज !
कौन- से स्वर पर उठेंगे आज रंगिणि बोल ?
कौन-मा सम साध गाओगी सजनि हिंडोल ?
देवि, केसरिया सुहागन का बने फिर साज,
अश्रु का पानी चढ़े करवाल दल पर आज,
सुमुखि हिमनग पर सुदृढ़ हाथों चढ़े नव साज,
और जैजैवन्तियों से यों सधे अन्दाज,
प्राण पर, प्रण पर, कि जैसे छा गये ऋतुराज ?
आ गये ऋतुराज !

द्वारका का कृष्ण जब बंगाल पर छा जाय !
तब न क्यों कोचीन को काश्मीर की सुधि आय ?
जब कि दिल्ली के इरादों पर मुदित नेपाल,
अब तिलक हो एशिया की गोपियों के भाल,
ओ चरम सुन्दर ! दृगों में भा गये ऋतुराज !
आ गये ऋतुराज !

गेहुँओं के गर्व पर, सरसों उठी है झूम,
प्रकृति के सुकपोल रवि-किरणें रही हैं चूम,
आज ताण्डव पर बजे रस रुप राग धमार,
और उस पर हो गुलाबी रंग की बौछार ।
कौन-सी धुन तुम कसक में गा गये ऋतुराज ?
आ गये ऋतुराज !

आज किसके द्वार है शहनाइयों की धूम ?
और किसके खेत में किरणें रही हैं घूम ?
भारती की वेणि में गूंथा हुआ काश्मीर,
कर रहा है विश्व के संदेह सौ-सौ दूर ।
सखि वितस्ता के स्वरों ‘बलि’ गा गये ऋतुराज ।
आ गये ऋतुराज !

फूल से कलियाँ लगाये हैं मिलन की होड़,
हँस रहे हैं प्रकृति-मालिनि के सहस्रों मोड़,
रंग पर मधु-गन्ध की छबि छा रही अनमोल,
तरु लतायों झूल पंछी बोलते हैं बोल ।
ग्राम-वधुयों की ललक मुसुका गये ऋतुराज ।
आ गये ऋतुराज !

रागिनी पर, नृत्य पर, ‘छुम’ गा उठे ऋतुराज,
प्यार पर, साहित्य पर, इतरा उठे ऋतुराज,
चित्र पर आ मूर्ति को पिघला उठे ऋतुराज,
रूप पर रतनार वे गदरा उठे ऋतुराज,
भ्रमर में, मधु में, परस बरसा गये ऋतुराज ।
आ गये ऋतुराज !
(खण्डवा-1953)

 चाँदी की रात

सोने का दिन, चाँदी की रात, बना दी क्यों तुमने आकर ?

रवि का आना तप कर जाना, किसने जाना, किसने माना ?
सोने की लूट लुटाने में, रवि का कौशल भर पहिचाना ।

मैं थकी न स्वर्ण समेट सकी, रोई सुहाग पर पछताकर ।
सोने का दिन, चाँदी की रात, बना दी क्यों तुमने आकर ?

जब रात हुई पद-आहट से, बाहर न किसी की याद रही,
तारे गिन-गिनकर- भूल तुम्हें- यादें आबाद रहीं,

ला विरह दिया बाहर रहकर, बेहोशी दी घर में आकर ।
सोने का दिन, चाँदी की रात, बना दी क्यों तुमने आकर ?

निशि कटती, तारे बढ़ते थे, योगी कहते हों भला-भला,
तारों का तम्बू ढले भले, अपना पन्थी तो चला-चला,

उस बिछुड़न की बेहोशी में, रोदन को खोया गा गा-कर ।
सोने का दिन, चाँदी की रात, बना दी क्यों तुमने आकर ?

तुम थे मैंने कब पहचाना, गो अन्धकार चमकीला था।
तुम थे नभ का मुँह पीला था कलियों का आँचल गीला था।

तुमको खोकर खोते-खोते, खो डाला आज तुम्हें पाकर ।
सोने का दिन, चाँदी की रात, बना दी क्यों तुमने आकर ?

(इटारसी का डाकबंगला-1934)

मूरख कहानी

श्याम पुतली और उसमें खूब पानी ।
श्याम केशों पर फली है तब जवानी ।

लटक कर लट चूम बैठी ओठ उनके,
मुँहलगों की है बड़ी मूरख कहानी ।

श्याम लट हैं, श्याम पुतली, श्याम की छवि,
रूप पर थी क्या यही स्याही गिरानी ?

स्वर्ग में भुज-बाहु के चुप्पी कहाँ की?
जिन्दगी को मौत में गूँथो न रानी !
(खण्डवा-1935)

 हाय

मुझे ध्यान यह रहा तुम्हारा वीरों को अभिमान रहे,
बालकपन हो भले, चकित कर देने वाला ज्ञान रहे;

पढ़े-लिखे पशु न हो, गुणों की शान रहे, ईमान रहे,
मजदूरी पर मिटो, तुम्हारे काबू में भगवान् रहे ।

तुम पर विजयी किन्तु हाय ! किन्तु दुनियाँ के सुख सामान रहे;
श्री हरि बल दें, तुम्हे कभी उस अपनेपन का ध्यान रहे ।

(1918-एक पत्र में लिखकर कानपुर भेजा)

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