युगांत -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 2

युगांत -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 2

ताज

हाय! मृत्यु का ऐसा अमर, अपार्थिव पूजन?
जब विषण्ण, निर्जीव पड़ा हो जग का जीवन!
संग-सौध में हो शृंगार मरण का शोभन,
नग्न, क्षुधातुर, वास-विहीन रहें जीवित जन?

मानव! ऐसी भी विरक्ति क्या जीवन के प्रति?
आत्मा का अपमान, प्रेत औ’ छाया से रति!!
प्रेम-अर्चना यही, करें हम मरण को वरण?
स्थापित कर कंकाल, भरें जीवन का प्रांगण?
शव को दें हम रूप, रंग, आदर मानन का
मानव को हम कुत्सित चित्र बना दें शव का?

गत-युग के बहु धर्म-रूढ़ि के ताज मनोहर
मानव के मोहांध हृदय में किए हुए घर!
भूल गये हम जीवन का संदेश अनश्वर,
मृतकों के हैं मृतक, जीवतों का है ईश्वर!

(अक्टूबर१९३५)

बाँधो, छबि के नव बन्धन बाँधो

बाँधो, छबि के नव बन्धन बाँधो!
नव नव आशाकांक्षाओं में
तन-मन-जीवन बाँधो!
छबि के नव–

भाव रूप में, गीत स्वरों में,
गंध कुसुम में, स्मित अधरों में,
जीवन की तमिस्र-वेणी में
निज प्रकाश-कण बाँधो!
छबि के नव–

सुख से दुख औ’ प्रलय से सृजन
चिर आत्मा से अस्थिर रज-तन,
महामरण को जग-जीवन का
दे आलिंगन बाँधो!
छबि के नव–

बाँधो जलनिधि लघु जल-कण में,
महाकाल को कवलित क्षण में,
फिर-फिर अपनेपन को मुझमें
चिर जीवन-धन! बाँधो!
छबि के नव–

(जुलाई’१९३४)

 मंजरित आम्र-वन-छाया में

मंजरित आम्र-वन-छाया में
हम प्रिये, मिले थे प्रथम बार,
ऊपर हरीतिमा नभ गुंजित,
नीचे चन्द्रातप छना स्फार!
तुम मुग्धा थी, अति भाव-प्रवण,
उकसे थे, अँबियों-से उरोज,
चंचल, प्रगल्भ, हँसमुख, उदार,
मैं सलज,–तुम्हें था रहा खोज!
छनती थी ज्योत्स्ना शशि-मुख पर,
मैं करता था मुख-सुधा पान,–
कूकी थी कोकिल, हिले मुकुल,
भर गए गन्ध से मुग्ध प्राण!
तुमने अधरों पर धरे अधर,
मैंने कोमल वपु-भरा गोद,
था आत्म-समर्पण सरल, मधुर,
मिल गए सहज मारुतामोद!
मंजरित आम्र-द्रुम के नीचे
हम प्रिये, मिले थे प्रथम बार,
मधु के कर में था प्रणय-बाण,
पिक के उर में पावक-पुकार!

(मई’१९३५)

वह विजन चाँदनी की घाटी

वह विजन चाँदनी की घाटी
छाई मृदु वन-तरु-गन्ध जहाँ,
नीबू-आड़ू के मुकुलों के
मद से मलयानिल लदा वहाँ!

सौरभ-श्लथ हो जाते तन-मन,
बिछते झर-झर मृदु सुमन-शयन,
जिन पर छन, कम्पित पत्रों से,
लिखती कुछ ज्योत्सना जहाँ-तहाँ!

आ कोकिल का कोमल कूजन,
उकसाता आकुल उर-कम्पन,
यौवन का री वह मधुर स्वर्ग,
जीवन बाधाएँ वहाँ कहाँ?

(मई’१९३५)

 वह लेटी है तरु-छाया में

छाया? वह लेटी है तरु-छाया में
सन्ध्या-विहार को आया मैं।
मृदु बाँह मोड़, उपधान किए,
ज्यों प्रेम-लालसा पान किए;
उभरे उरोज, कुन्तल खोले,
एकाकिनि, कोई क्या बोले?
वह सुन्दर है, साँवली सही,
तरुणी है–हो षोड़षी रही;
विवसना, लता-सी तन्वंगिनि,
निर्जन में क्षण भर की संगिनि!
वह जागी है अथवा सोई?
मूर्छित या स्वप्न-मूढ़ कोई?
नारी कि अप्सरा या माया?
अथवा केवल तरु की छाया?

(अप्रैल’१९३५)

 अँधियाली घाटी में

अँधियाली घाटी में सहसा
हरित स्फुलिंग सदृश फूटा वह!
वह उड़ता दीपक निशीथ का,–
तारा-सा आकर टूटा वह!

जीवन के इस अन्धकार में
मानव-आत्मा का प्रकाश-कण
जग सहसा, ज्योतित कर देता
मानस के चिर गुह्य कुंज-वन!

(मई’१९३५)

Leave a Reply