युगवाणी -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 4

युगवाणी -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 4

बदली का प्रभात

निशि के तम में झर झर
हलकी जल की फूही
धरती को कर गई सजल ।

अंधियाली में छन कर
निर्मल जल की फूही
तृण तरु को कर उज्जवल !

बीती रात,…
धूमिल सजल प्रभात
वृष्टि शून्य, नव स्नात ।
अलस, उनींदा सा जग,
कोमलाभ, दृग सुभग !

कहाँ मनुज को अवसर
देखे मधुर प्रकृति मुख ?
भव अभाव से जर्जर,
प्रकृति उसे देगी सुख ?

बंद तुम्हारे द्वार

बंद तुम्हारे द्वार ?
मुसकाती प्राची में ऊषा
ले किरणों का हार,
जागी सरसी में सरोजिनी,
सोई तुम इस बार ?
बंद तुम्हारे द्वार ?

नव मधु में,-अस्थिर मलयानिल,
भौरों में गुंजार,
विहग कंठ में गान,
मौन पुष्पों में सौरभ भार,
बंद तुम्हारे द्वार ?

प्राण ! प्रतीक्षा में प्रकाश
औ’ प्रेम बने प्रतिहार !
पथ दिखलाने को प्रकाश,
तुमसे मिलने को प्यार !
बंद तुम्हारे द्वार ?

गीत हर्ष के पंख मार
आकाश कर रहे पार,
भेद सकेगी नहीं हृदय
प्राणों की मर्म पुकार !
बंद तुम्हारे द्वार ?

आज निछावर सुरभि,
खुला जग में मधु का भंडार,
दबा सकोगी तुम्हीं आज
उर में मधु जीवन ज्वार ?
बंद तुम्हारे द्वार !

बापू

किन तत्वों से गढ़ जाओगे तुम भावी मानव को ?
किस प्रकाश से भर जाओगे इस समरोन्मुख भव को ?
सत्य अहिंसा से आलोकित होगा मानव का मन ?
अमर प्रेम का मधुर स्वर्ग बन जाएगा जग जीवन ?
आत्मा की महिमा से मंडित होगी नव मानवता ?
प्रेम शक्ति से चि रनिरस्त हो जाएगी पाश्वता ?

बापू ! तुमसे सुन आत्मा का तेजराशि आह्वान
हँस उठते हैं रोम हर्ष से पुलकित होते प्राण !
भूतवाद उस धरा स्वर्ग के लिए मात्र सोपान,
जहाँ आत्म दर्शन अनादि से समासीन अम्लान !
नहीं जानता, युग विवर्त में होगा कितना जन क्षय,
पर, मनुष्य को सत्य अहिंसा इष्ट रहेंगे निश्चय !
नव संस्कृति के दूत ! देवताओं का करने कार्य
मानव आत्मा को उबारने आए तुम अनिवार्य ।

भूत दर्शन

कहता भौतिकवाद, वस्तु जग का कर तत्वान्वेषण :-
भौतिक भव ही एक मात्र मानव का अंतर दर्पण !
स्थूल सत्य आधार, सूक्ष्म आधेय, हमारा जो मन,
बाह्य विवर्तन से होता युगपत् अंतर परिवर्तन !

राष्ट्र, वर्ग, आदर्श, धर्म, गत रीति नीति भौ’ दर्शन
स्वर्ण पाश हैं : मुक्ति योजना सामूहिक जन जीवन ।
दर्शन युग का अंत, अंत विज्ञानों का संघर्षण,
अब दर्शन-विज्ञान सत्य का करता नव्य निरूपण ।

नवोद्भूत इतिहास-भूत सक्रिय, सकरण, जड़ चेतन
द्वन्द्व तर्क से अभिव्यक्ति पाता युग युग में नूतन,
अन्त आज साम्राज्यवाद, धनपति वर्गों का शासन,
प्रस्तर युग की जीर्ण सभ्यता मरणासन्न, समापन !

साम्यवाद के साथ स्वर्ण युग करता मधुर पदार्पण,
मुक्त निखिल मानवता करती मानव का अभिवादन !

धनपति

वे नृशंस हैं : वे जन के श्रमबल से पोषित,
दुहरे धनी, जोंक जग के, भू जिनसे शोषित !
नहीं जिन्हें करनी श्रम से जीविका उपार्जित,
नैतिकता से भी रहते जो अत: अपरिचित !

शय्या की क्रीड़ा कंदुक है उनको नारी,
अहंमन्य वे, मूढ़, अर्थबल के व्यभिचारी !
सुरांगना, संपदा, सुराओं से संसेवित,
नर पशु वे : भू भार : मनुजता जिनसे लज्जित !

दर्पी, हठी, निरंकुश, निर्मम, कलुषित, कुत्सित,
गत संस्कृति के गरल, लोक जीवन जिनसे मृत !
जग जीवन का दुरुपयोग है उनका जीवन,
अब न प्रयोजन उनका, अन्तिम हैं उनके क्षण ।

दो लड़के

मेरे आँगन में, (टीले पर है मेरा घर)
दो छोटे-से लड़के आ जाते हैं अकसर !
नंगे तन, गदवदे, साँवले, सहज छबीले,
मिट्टी के मटमैले पुतले,-पर फुर्तीले !

जल्दी से, टीले के नीचे, उधर, उतर कर
वे चुन ले जाते कूड़े से निधियाँ सुंदर,-
सिगरेट के खाली डिब्बे, पन्नी चमकीली,
फीतों के टुकडे, तस्वीरें नीली पीली
मासिक पत्रों के कवरों की; औ’ बंदर-से
किलकारी भरते हैं, खुश हो-हो अन्दर से ।
दौड़ पार आँगन के फिर हो जाते ओझल
वे नाते छ: सात साल के लड़के मांसल !

सुदर लगती नग्न देह, मोहती नयन-मन,
मानव के नाते उर में भरता अपनापन !
मानव के बालक हैं ये पासी के बच्चे,
रोम रोम मानव, साँचे में ढाले सच्चे !
अस्थि मांस के इन जीवों ही का यह जग धर,
आत्मा का अधिवास न यह,-वह सूक्ष्म, अनश्वर !
न्योछावर है आत्मा नश्वर रक्त मांस पर,
जग का अधिकारी हैं वह, जो है दुर्बलतर !

वह्नि, बाढ़, उल्का, झंझा की भीषण भू पर
कैसे रह सकता है कोमल मनुज कलेवर ?
निष्ठुर है जड़ प्रकृति, सहज भंगुर जीवित जन,
मानव को चाहिए यहाँ मनुजोचित साधन !
क्यों न एक हो मानव मानव सभी परस्पर
मानवता निर्माण करें जग में लोकोत्तर ?
जीवन का प्रासाद उठे भू पर गौरवमय,
मानव का साम्राज्य बने,-मानव हित निश्चय !

जीवन की क्षण-धूलि रह सके जहाँ सुरक्षित,
रक्त मांस की इच्छाएँ जन की हों पूरित !
-मनुज प्रेम से जहाँ रह सकें,-मानव ईश्वर !
और कौन सा स्वर्ग चाहिए तुझे धरा पर ?

दो मित्र

उस निर्जन टीले पर
दोनों चिलबिल
एक दूसरे से मिल,
मित्रों-से हैं खड़े,
मौन, मनोहर !

दोनों पादप
सह वर्षातप,
हुए साथ ही बड़े
दीर्ध, सुदृढ़तर !

पतझर में सब पत्र गए झर,
नग्न, धवल डालों पर
पतली, टेढ़ी टहनी अगणित
शिरा जाल सी फैली अविरल,-
तरुओं की रेखा छवि अविकल
भू पर कर छायांकित !

नील, निरभ्र गगन पर
चित्रित-से दो तरुवर
आँखों को लगते हैं सुंदर,
मन को सुखकर !

मध्यवर्ग

संस्कृति का वह दास : विविध विश्वास विधायक,
निखिल ज्ञान, विज्ञान, नीतियों का उन्नायक !
उच्च वर्ग की सुविधा का शास्त्रोक्त प्रचारक,
प्रभु सेवक, जन वंचक वह, निज वर्ग प्रतारक ।

भोग शील, धनिकों का स्पर्धी, जीवन-प्रिय अति,
आत्म वृद्ध, संकीर्ण हृदय, तार्किक, व्यापक मति!
पाप पुण्य संत्रस्त, अस्थियों का बहु कोमल,
वाक्, कुशल, धी दर्पी, अति विवेक से निर्बल ।

मध्यवर्ग का मानव, वह परिजन पत्नी प्रिय,
यशकामी, व्यक्तित्व प्रसारक, पर हित निष्क्रिय !
श्रमजीवी वह, यदि श्रमिकों का हो अभिभावक,
नवयुग का वाहक हो, नेता, लोक प्रभावक ।

 मानव पशु

मानव के पशु के प्रति
हो उदार नव संस्कृति !
युग युग से रच शत शत नैतिक बंधन
बाँध दिया मानव ने पीड़ित पशु तन,
विद्रोही हो उठा आज पशु दर्पित,
वह न रहेगा अब नव युग में गर्हित,
नहीं सहेगा रे वह अनुचित ताड़न,
रीति नीतियों का गत निर्मम शासन !
वह भी क्या मानव जीवन का लांछन ?
वह, मानव के देव भाव का वाहन !

नहीं रहे जीवनोपाय तब विकसित !
जीवन यापन कर न सके सब इच्छित ।
नैतिक सीमाएँ बहु कर निर्धारित,
जीवन इच्छा की जन ने मर्यादित !
भू मानव के श्रेयस् के हित निश्चित
पशु ने अपनी बलि दी, देवों के हित ।
जीवन के उपकरण अखिल कर अधिकृत
गत युग का पशु हुआ आज मनुजोचित ।
देव और पशु, भावों में जो सीमित,
युग युग में होते परिवर्तित, अवसित ।
मानव पशु ने किया आज भव अर्जित,
मानब देव हुआ अब वह सम्मानित !

मानव के पशु के प्रति
मध्यवर्ग की हो रति !

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