यार जुलाहे-बूढ़े पहाड़ों पर-गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar 

यार जुलाहे-बूढ़े पहाड़ों पर-गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar

यार जुलाहे, यार जुलाहे
मुझको भी तरकीब सिखा कोई
यार जुलाहे, यार जुलाहे…

अक्सर तुझको देखा है कि ताना बुनते
जब कोई तागा टूट गया तो
और सिरा कोई जोड़ के उसमें
आगे बुनने लगते हो
तेरे इस ताने में लेकिन
इक भी गाँठ, गिरह बुनतर की
देख नहीं सकता है कोई
यार जुलाहे, यार जुलाहे…

मैंने तो इक बार बुना था
एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिरहें
साफ़ नज़र आती हैं मेरे यार जुलाहे
यार जुलाहे, यार जुलाहे

Leave a Reply