यह प्रवाह है-प्राण गीत-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

यह प्रवाह है-प्राण गीत-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

यह प्रवाह है, यह न रुका है, यह न रुकेगा ।

जाने दो अवरोध पर्वतों की काया धर,
लगने दो गिरि-चट्टानों की हाट बाट पर,
उठने दो भूचाल आँधियों के आँगन में,
झरने दो उल्काओं की बरसात गगन से,
या न मौसमी जल गड्ढों में जो बंध जाये,
यह प्रवाह है, यह न रुका है, यह न रुकेगा ।

कुछ परवाह नहीं जो अम्बर में हलचल है,
चिंता क्या जो सम्मुख मुरदों का दल बल है,
चीख़ रहा विध्वंस, ढह रहा संस्कृति का गढ़,
मानवता की लाश रक्त में पड़ी रही सड़,
यह न नाश का दूत, थके जो इस बस्ती में,
यह विकास है, यह न थका है, यह न थकेगा ।

मुट्ठी में भूकम्प, शीश पर मेरु उठाये,
नयनों में निर्माण, कण्ठ में राग बसाये,
एकाकी पाथेयहीन तन, मन चिर, जर्जर,
स्वर्ग छीन लाने को जो बढ़ रहा निरन्तर,
उसे झुकाने, उसे मिटाने की सोचो मत,
वह मनुष्य है, वह न झुका है, वह न झुकेगा,
वह भविष्य है, वह न मिटा है, वह न मिटेगा,
वह विकास है, वह न थका है, वह न थकेगा,
वह प्रवाह है, वह न रुका है, वह न रुकेगा ।

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