यहां से शहर को देखो-सरे-वादी-ए-सीना -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz 

यहां से शहर को देखो-सरे-वादी-ए-सीना -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

यहां से शहर को देखो तो हलका-दर-हलका
खिंची है जेल की सूरत हर एक सिमत फ़सील
हरेक राहगुज़र गरदिशे-असीरां है
ना संगे-मील, ना मंज़िल, न मुख़लिसी की सबील

जो कोई तेज़ चले रह, तो पूछता है ख़्याल
कि टोकने कोई ललकार कयूं नहीं आई
जो कोई हाथ हिलाये तो वहम को है सवाल
कोई छनक, कोई झंकार कयूं नहीं आई

यहां से शहर को देखो तो सारी ख़लकत में
न कोई साहबे-तमकीं न कोई वाली-ए-होश
हरेक मरदे-जवांमुजरिमे-रसन-ब-गुलू
हरइक हसीना-ए-राना कनीज़े-हलका-ब-गोश

जो साये दूर चिराग़ों के गिरद लरज़ां हैं
न जाने महफ़िले-ग़म है कि बज़्मे-जामो-सुबू
जो रंग हर दरो-दीवार पर परीशां हैं
यहां से कुछ नहीं खुलता-ये फूल हैं कि लहू

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