यशोधरा की जागृत निंद्रा-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

यशोधरा की जागृत निंद्रा-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

 

मैं यशोधरा क्या करती..
जिस रात्रि उन्होंने त्यागा गृह
उस रात्रि कहाँ मैं सोयी थी
निद्रा के मिस दृग बंद किये,
अति आकुलता से रोयी थी।

अवलोक रही थी मैं उनको
पक्ष्मों का अवगुंठन लेकर,
सुन रही मौन, उनके व्याकुल
अंतर तल की पीड़ा के स्वर।

उनके नेत्रों से अश्रु बिंदु
गिरते ही स्पर्श करते क्षिति को
मानस पट से थे मिटा रहे
वात्सल्य भाव, प्रणय स्मृति को।

वे जाकर पुनः लौट आते,
अपने प्रकोष्ठ के द्वारों से
हम दोनों को लख हार रहे,
निज अंतस् के उद्गारों से।

मैं विक्षिप्तों सी लेटी थी,
भीतर से शोकाकुल होकर
उठ सकी नहीं, निश्चेष्ट रही
आँसू के सागर में खोकर।

‘मैं जाग रही, सब देख रही’
यदि उन्हें ज्ञात यह हो जाता,
तब उनके द्वारा हम सबका
परित्याग न संभव हो पाता।

मेरी आकुलता देख उन्हें
रूकने की इच्छा आ जाती,
उनके गतिशील चरण दल में
संभवतः जड़ता छा जाती।

उस रजनी, यदि मैं जग जाती,
क्या “आर्य” स्वयं से जग पाते?
क्या उनको मिलता वर-ज्ञान,
या वे साधना सुभग पाते?

मैं स्वेच्छा से सो गयी ताकि,
सर्वदा मिले उनको जागृति
आजीवन होता रहे प्राप्त,
मुझको जड़ता उनको स्फुर गति।

वे मुझको बेसुध जान, रात्रि
में हो स्वंत्रत गृह त्याग गये,
मेरी निद्रा सोपान बनी
वे “बुद्ध” बने औ’ जाग गये।

“वे बिन पूछे ही चले गये”
संसार समझता ही आया,
पर वे माँगे थे “मौनाज्ञा”
जो केवल मुझ तक ही आया।

‘मैं मन ही मन ‘अनुमति’ दे दी’
यह सत्य सृष्टि न जान सकी,
मेरी उस “जाग्रत-निद्रा” का
उद्देश्य नहीं पहचान सकी।

 

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