यवनराजत्व-भारत-भारती (अतीत खण्ड) -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Bharat-Bharti( Ateet Khand)

यवनराजत्व-भारत-भारती (अतीत खण्ड) -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Bharat-Bharti( Ateet Khand)

 

यवनराजत्व

जो हम कभी फूले-फले थे राम-राज्य-वसन्त में,
हा ! देखनी हमको पड़ी औरङ्गजेबी अन्त में !
है कर्म्म का ही दोष अथवा सब समय की बात है,
होता कभी दिन है, कभी होती अँधेरी रात है ।।२२४।।

है विश्व में सबसे बली सर्वान्तकारी काल ही,
होता अहो अपना पराया काल के वश हाल ही ।
बनता कुतुबमीनार यमुनास्तम्भ का निर्वाद है,
उस तीर्थराज प्रयाग का बनता इलाहाबाद है ! ।।२२५।।

 

अत्याचार

जो हो, हमारी दुर्दशा का और अन्त नहीं रहा,
हा ! क्या कहें; कितना हमारा रक्त पानी-सा बहा !
हो कर सनुज, कृमि-कीट से भी तुल्य हम लेखे गये;
दृष्टान्त ऐसे बहुत ही कम विश्व में देखे गये ।।२२६।।

रहते यवन थे रक्त-रंजित तीक्ष्ण असि ताने खड़े,
चोटी, नहीं तो हाय ! हमको शीश कटवाने पड़े !
जीते हुए दीवार में हम लोग चुनवाये गये,
बल से असंख्यक आर्य्य इसलाम में लाये गये !! ॥२२७॥

हा स्वार्थ-वश हमको अनेकों घोर कष्ट दिये गये,
कितने अवश अबला जनों के धर्म नष्ट किये गये,
घर में सुता के जन्म से होती बड़ों को थी व्यथा,
कुल-मान रखने को चली थी बालिका-वध की प्रथा ! ।।२२८।।

हा ! निष्ठुरों के हाथ से सुर-मूर्तियाँ खण्डित हुईं,
बहु मन्दिरों की वस्तुओं से मसजिदें मण्डित हुईं।
जजिया-सरीखे कर लगे, यह बात सिद्ध हुई सही-
जो प्राप्त हो परतन्त्रता में दुःख थोड़ा है वही ।। २२९ ।।

 

प्रशंसा

इससे न यह समझो कि यों ही वह समय बीता सभी,
ऐसा नहीं है, उन दिनों भी था सु-काल कभी कभी ।
निज शत्रु तक के गुण हमें कहना उचित है सब कहीं,
सच के छिपाने के बराबर पाप कोई है नहीं ।। २३० ।।

ऐसा नहीं होता कि सारी जाति कोई क्रूर हो,
सम्भव नहीं कि समाज भर से ही सदयता दूर हो ।
अतएव ऐसे भी यवन-सम्राट कुछ हैं हो गए।
जातीय-पङ्क-कलङ्क को जो कीर्ति-जल से धो गये ।। २३१ ।।

 

अकबर

कम कीर्ति अकबर की नहीं सत्शासकों की ख्याति में,
शासक ने उसके सम सभी होंगे किसी भी जाति में ।
हों हिन्दुओं के अर्थ हिन्दु, यवन यवनों के लिये,
हठ, पक्षपात तथा दुराग्रह दूर उसने थे किये ।। २३२ ।।

निज राज्य में सुख-शान्ति का विस्तार वह करता रहा,
अन्याय, अत्याचार को सब भाँति वह हरता रहा ।
निज शत्रुओं के भी गुणों का मान उसने था किया,
विश्वासपूर्वक हिन्दुओं को सचिव तक का पद दिया ।।२३३।।

 

भाषा और कवि

उस काल भाषा भी हमारी उच्च पद पाती रही,
हाँ, फारसी-फरमान तक पर वह लिखी जाती रही ।
श्री सूर, तुलसी, देव, केशव, कवि विहारी-सम हुए,
जिनके अतुल ग्रंथाकरों से भाव-रत्नोद्गम हुए ॥२३४॥

 

औरंगज़ेब

यदि पूर्वजों की नीति को औरंगज़ेब न भूलता-
होती यवन राजत्व पर विधि की न यों प्रतिकूलता।
गो-वध मिटाने को कहाँ वह पूर्वजों की घोषणा-
सोचो, कहाँ यह हिन्दुओं के धर्म-धन की शोषणा ॥२३५॥

अन्याय ऐसे, पुरुष होकर हाय ! हम सहते रहे,
करके न कुछ उद्योग विधि की बात ही कहते रहे।
हम चाहते तो एक होकर क्या न कर सकते भला?
पर ऐक्य का तो नाम लेते ही यहाँ घुटता गला !! ॥२३६॥

 

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