मज़हब-ए-शायराना-नज़्में -बृज नारायण चकबस्त-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Brij Narayan Chakbast

मज़हब-ए-शायराना-नज़्में -बृज नारायण चकबस्त-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Brij Narayan Chakbast

कहते हैं जिसे अब्र वो मैख़ाना है मेरा
जो फूल खिला बाग़ में पैमाना है मेरा ।

क़ैफ़ीयते गुलशन है मेरे नशे का आलम
कोयल की सदा नारा-ए-मस्ताना है मेरा ।

पीता हूँ वो मय नशा उतरता नहीं जिसका
ख़ाली नहीं होता है वो पैमाना है मेरा ।

दरिया मेरा आईना है लहरें मेरे गेसू
और मौज-ए-नसीम-ए-सहरी शाना मेरा ।

हर ज़र्रा-ए-ख़ाकी है मेरा मूनिस-ओ-हमदम
दुनिया जिसे कहते हैं वो काशाना है मेरा ।

जिस जा हो ख़ुशी है वो मुझे मंज़िल-ए-राहत
जिस घर में हो मातम वो अज़ाख़ाना है मेरा ।

जिस गोशा-ए-दुनिया में परिस्तिश हो जहाँ की
काबा है वही और वही बुतख़ाना है मेरा ।

मैं दोस्त भी अपना हूँ अदू भी हूँ मैं अपना
अपना है कोई और न बेगाना है मेरा ।

आशिक़ भी हूँ, माशूक़ भी ये तुरफ़ा मज़ा है
दीवाना हूँ मैं जिसका वो दीवाना है मेरा ।

ख़ामोशी में याँ रहता है तक़रीर का आलम
मेरे लब-ए-ख़ामोश पे अफ़साना है मेरा ।

कहते हैं खुदी किसको ख़ुदा नाम है किसका
दुनिया में फ़क़त जलवा-ए-जानाना है मेरा ।

मिलता नहीं हरएक को वो नूर है मुझमें
जो साहिब-ए-बीनश हो वो परवाना है मेरा ।

शायर का सुख़न कम नहीं मज़ज़ूब की बड़ से
हर एक न समझेगा वो अफ़साना है मेरा ।

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