मौहूम अफ़्साने-नज़्में जाँ निसार अख़्तर-जाँ निसार अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaan Nisar Akhtar

मौहूम अफ़्साने-नज़्में जाँ निसार अख़्तर-जाँ निसार अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaan Nisar Akhtar

वो अफ़्साने किया है चाँद तारों का सफ़र जिन में
ये दुनिया एक धुँदली गेंद आती है नज़र जिन में
वो जिन में मुल्क-ए-बर्क़-ओ-बाद तक तस्ख़ीर होता है
जहाँ इक शब में सोने का महल तामीर होता है
अछूते-साहिलों के वो सहर-आलूद वीराने
तिलिस्मी-क़स्र में गुमनाम शहज़ादी के अफ़्साने

वो अफ़्साने जो रातें चाँद के बरबत पे गाती हैं
वो अफ़्साने जो सुब्हें रूह के अंदर जगाती हैं
फ़ज़ा करती है जिन मौहूम अफ़्सानों की तामीरें
भटकते अब्र में जिन की मिलीं मुबहम सी तस्वीरें
सर-ए-साहिल जो बहती शम्अ की लौ गुनगुनाती है
दिमाग़ ओ दिल में जिन से इक किरन सी दौड़ जाती है

वो अफ़्साने जो दिल को बे-कहे महसूस होते हैं
जो होंटों की हसीं गुलनार मेहराबों में सोते हैं
किसी की नर्गिस-ए-शरसार के मुबहम से अफ़्साने
किसी की ज़ुल्फ़-ए-अम्बर-बार के बरहम से अफ़्साने
वो जिन को इस तरह कुछ जुम्बिश-ए-मिज़्गाँ सुनाती है
कि जैसे ख़्वाब में भूली हुई इक याद आती है
रहा हूँ गुम इन्ही मौहूम अफ़्सानों की बस्ती में
इन्ही दिलकश मगर गुमनाम रूमानों की बस्ती में
किसी ने तोड़ डाला ये तिलिस्म-ए-कैफ़-ओ-ख़्वाब आख़िर
मिरी आँखों के आगे आए शमशीर ओ शबाब आख़िर

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