मौत को साधे शब्द-खुली आँखें खुले डैने -केदारनाथ अग्रवाल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kedarnath Agarwal

मौत को साधे शब्द-खुली आँखें खुले डैने -केदारनाथ अग्रवाल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kedarnath Agarwal

मौत को साधे शब्द
अंतरंग से बाहर
यथार्थ की दुनिया में
आए, अकुलाए
सर्वत्र टकराए।
भोगते-भोगते
देश-काल की विसंगतियाँ;
न सच तक पहुँच पाए,
न असत्य को उखाड़ पाए;
न वर पाए
वरेण्य मानवीय बोध;
न कर पाए
अपना या दूसरों का शोध-
दहन-दाह के प्रतिकूल-
आत्म-प्रसार के अनुकूल;
बस,
झाँकते शब्द झाँकते रहे-
बुदबुदाते शब्द बुदबुदाते रहे-
काल से कवलित होते-होते
दृश्य से अदृश्य में
विगलित होते शब्द
होते रहे अशब्द।

रचनाकाल: ०३-११-१९८३ /
२०-१२-१९९०

 

Leave a Reply