मौत का धड़का-सूफ़ियाना कलाम -नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

मौत का धड़का-सूफ़ियाना कलाम -नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

दुनिया के बीच यारो, सब ज़ीस्त का मज़ा है।
जीतों के वास्ते ही यह ठाठ सब ठठा है।
जब मर गए तो आखिर, फिर उम्र ख़ाके-पा है।
ने बाप है न बेटा, ने यार आश्ना है।
डरती है रूह यारो, और जी भी कांपता है॥
मरने का नाम मत लो, मरना बुरी बला है॥1॥

जीतों के दिल को हर दम क्या ऐश पै-व-पै है।
गुलज़ार, नाच, सेरें, साक़ी, सुराही मै है।
जब मर गए तो हरग़िज मैं है न कोई शै है।
इस मर्ग के सितम को, क्या-क्या कहूं मैं है-है।
डरती है रूह यारो, और जी भी कांपता है॥
मरने का नाम मत लो, मरना बुरी बला है॥2॥

है दम की बात, जो थे मालिक यह अपने घर के।
जब मर गए तो हरगिज़ घर के रहे न दर के।
यूं मिट गए कि गोया थे नक़्श रहगुज़र के।
पूछा न फिर किसी ने ये थे मियां किधर के।
डरती है रूह यारो, और जी भी कांपता है॥
मरने का नाम मत लो, मरना बुरी बला है॥3॥

मरने के बाद कोई उल्फ़त न फिर जतावे।
ने बेटा पास आवे, ने भाई मुंह लगावे।
जो देखे उनकी सूरत, दहशत से भाग जावे।
इस मर्ग की जफ़ाएँ, क्या क्या कोई सुनावे।
डरती है रूह यारो, और जी भी कांपता है॥
मरने का नाम मत लो, मरना बुरी बला है॥4॥

पीते थे दूध, शर्बत और चाबते थे मेवा।
मरते ही फिर कुछ उनका, सिक्का रहा न थेवा।
बच्चे यतीम हो गए, बीवी कहाई ‘बेवा’।
इस मर्ग ने उखाड़ा किस किस बदन का लेवा।
डरती है रूह यारो, और जी भी कांपता है॥
मरने का नाम मत लो, मरना बुरी बला है॥5॥

जब रूह तन से निकली, आना नहीं यहां फिर।
काहे को देखते हैं, यह बाग़ो बोस्तां फिर।
हाथी पे चढ़ के यां फिर घोड़े पे चढ़के वां फिर।
जब मर गए तो लोगों यह इश्रतें कहां फिर।
डरती है रूह यारो, और जी भी कांपता है॥
मरने का नाम मत लो, मरना बुरी बला है॥6॥

घर हो बहिश्त जिनका और भर रही हो दौलत।
असबाब इश्रतों के, महबूब खूबसूरत।
फिर मरते वक़्त उनको क्यूंकर न होवे हसरत।
क्या सख़्त बेबसी है, क्या सख़्त है मुसीबत।
डरती है रूह यारो, और जी भी कांपता है॥
मरने का नाम मत लो, मरना बुरी बला है॥7॥

खाने को उनके नेमत सौ सौ तरह की आती।
और वह न पावें टुकड़ा देखो टुक उनकी छाती।
कौड़ी की झोपड़ी भी, छोड़ी नहीं है जाती।
लेकिन “नज़ीर” सब कुछ यह मौत है छुड़ाती।
डरती है रूह यारो, और जी भी कांपता है॥
मरने का नाम मत लो, मरना बुरी बला है॥8॥

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