मौजिज़ा हज़रत अब्बास बिन अली करमुल्लाह वजह- कविता (धार्मिक)-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi 

मौजिज़ा हज़रत अब्बास बिन अली करमुल्लाह वजह- कविता (धार्मिक)-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

जो मुहिब हैं ख़ान्दाने मुस्तफ़ा के दोस्त दार।
और अलीए मुर्तजा पर जानो दिल से हैं निसार।
सब सुनें दिलशाद हो यह माजरा तफ़सील दार।
हैं जो अब्बासे अली कर्रार गाजी नाम दार।
उनका मैं एक मौजिजा लिखता हूं बा इज़्ज़ो विक़ार॥1॥

शहर है अरकाट इक वां एक साहूकार था।
जितने वां ज़रदार थे उन सब में वह सरदार था।
मालो ज़र का घर में इसके जा बजा अंबार था।
उसके एक बेटा सआदतमंद बरख़ुर्दार था।
गुल बदन गुल पैरहन गुल रंग गुलरू गुल इज़ार॥2॥

दूसरा उसके कोई बेटी न बेटा था मगर।
एक बेटा था वही वाँ सरवरे रश्के क़मर॥
था पिन्हाता उसको पोशाक और जवाहर सरबसर।
बस कि इकलौता जो था इस वास्ते उसके ऊपर॥
बाप भी जी से फ़िदा और मां भी दिल से थी निसार॥3॥

उन दिनों में था बरस तेरह का उसका सिन्नो साल।
जब नज़र आया उसे माहे मुहर्रम का हिलाल।
ताज़िया ख़ानों में जाता छुप के वह राना ग़िजाल।
मर्सियों में सुनके शाहे कर्बला के ग़म का हाल।
पीटता सीने को और मातम से रोता ज़ार-ज़ार॥4॥

ताजिये के सामने होके मोअद्दब सर झुका।
मोरछल रो रो ज़रीहे पाक पर झलता खड़ा।
जब अलम उठते तो फिर लड़कों के साथ आंसू बहा।
या हुसैन इब्ने अली कह कर अलम लेता उठा।
लोग देख उसकी मुहब्बत होते थे हैरान कार॥5॥

शाम से आकर वह क़न्दीले जलाता दमबदम।
कु़मकु़मे और झाड़ पर शमए चढ़ाता दम बदम।
औद सोजों में अगर लाकर गिराता दम बदम।
अहले मजलिस के तई शर्बत पिलाता दम बदम।
सब वह करता था ग़रज जितना था वां का कारोबार॥6॥

लेकिन उसके बाप को हर्गिज ख़बर अब तक न थी।
जब सुना उसने तो बेटे पर बहुत ताक़ीद की।
झिड़का और मारे तमांचे खूब सी तम्बीह की।
और कहा ऐ बे हया बदबख़्त मूजी मुद्दई।
ज़ात से क्या तू निकालेगा मुझे ऐ नाबकार॥7॥

उसके दिल में तो शहीदे कर्बला का जोश था।
ताज़िये पर ध्यान था और मर्सिये बर गोश था।
बाप तो करता नसीहत और वह ख़ामोश था।
ने तमांचों का उसे ने झिड़कियों का होश था।
उठ गया था उसके दिल से साफ़ सबका नंगो आर॥8॥

बाप ने तो दिन में यह उस पर किया रंजो इताब।
रात को फिर ताज़िया ख़ानों में जा पहुंचा शिताब।
फिर पकड़ लाया उसे जाकर बसद हाले खराब।
अल ग़रज सौ सौ तरह इस पर किये रंजो इताब।
उसने जाना न छोड़ा उस मकां का जीनहार॥9॥

अपना बेगाना उसे जाकर बहुत समझाता था।
पर किसी का कब कहा ख़ातिर में उसकी आता था।
रोना और मातम ही करना उसके दिल को भाता था।
ताज़िया खाने की जानिब यूँ वह दौड़ा जाता था।
जिस तरह आशिक़ किसी माशूक का हो बेक़रार॥10॥

जब तो सबने तंग हो यह मस्लहत ठानी बहम।
जिस से करता है यह मातम और उठाता है अलम।
क्यूं न अब इस दम वही हाथ इसका कर डालो क़लम।
कह के यह आखि़र को सबने, है क़यामत है सितम।
काट डाला हाथ जल्द उस बेगुनाह का एक बार॥11॥

अलग़रज़ कर हाथ उस मज़्लूम का तन से जुदा।
कोठरी में बंद करके और कु़फ्ल ऊपर जड़ा।
ने उसे खाना खिलाया ने उसे पानी दिया।
शाम तक भूका प्यासा कोठरी में था पड़ा।
देख अपने हाथ को रोता था धाड़ें मार-मार॥12॥

वह अंधेरी कोठरी वह भूक पानी की प्यास।
हाथ से लोहू की बूंदे भी टपकतीं आस पास।
किस मुसीबत में पड़ा वह गुल बदन जर्री लिबास।
हाथ जख़्मी, खून जारी, दिल परेशां जी उदास।
किस से मांगे दाद और किसको पुकारे बार-बार॥13॥

वह तो अपनी बेकसी के दर्द में रोता था वां।
इसमें क्या है देखता उस कोठरी के दरमियाँ।
हो गया एकबारगी नूरे तजल्ली का निशां।
इस तजल्ली में नज़र आया उसे एक नौ जवां।
कांधे के ऊपर अलम, पहलू में तेगे़ आबदार॥14॥

दास्ताना हाथ में और पुश्त के ऊपर सिपर।
तन में एक सीमीं जिरह और ख़ोद ज़र्री फ़र्क पर।
दायें को तीरो कमां बांये को शमशीरो तबर।
जिस तरह अबरे सिया में बर्क़ होवे जलवा गर।
इस तरह उस कोठरी में आ गया वह शह सवार॥15॥

उसने जब इस नौजवां के नूर की देखी झलक।
था मुजस्सिम वह तो हक़ का नूर सर से पाँव तक।
देखते ही इसका हैबत से गया सीना धड़क।
मुंद गई आंखें वहीं और खा गईं पलकें झपक।
हो गया बेहोश वह मजबूर जख़्मी दिलफ़िगार॥16॥

ताब किसकी है जो उस चेहरे के आगे ताब लाये।
माह क्या गर शम्स भी देखे तो अपना सर झुकाये।
ऐसे तालअ़ ऐसी क़िस्मत यह नसीबा कौन पाये।
ऐसा शहज़ादा मुक़द्दस जिसके घर तशरीफ़ लाये।
आदमी क्या है फ़रिश्तों का नहीं इज़्ज़ो विक़ार॥17॥

वह तो नूरे तजल्ली देख बे खु़द था पड़ा।
इस इनायत इस करम का कुछ भी यारो इन्तिहा।
आप घोड़े से उतर के नूर चश्मे लाफ़ता।
उस बरीदा दस्त को उसके दिया तन से मिला।
और कहा उठ जल्द ऐ आले नबी के पोस्तदार॥18॥

वह जो आंखें खोल कर देखे अजब अनवार है।
रौशनी से जिनकी रौशन सब दरो दीवार है।
हाथ को देखा तो ख़ासा हाथ भी तैयार है।
ने तो उसमें दर्द है न खू़न का आसार है।
रह गया एक बारगी हैरत में वह मज़लूम ज़ार॥19॥

फिर जो उस लड़के को उसमें होश सा कुछ आ गया।
हो तसद्दुक़ और वहीं पांव के ऊपर गिर पड़ा।
और कहां रो रो कि मेरा हाथ तन से था जुदा।
यह तुम्हीं से हो सका जो फिर दिया तन से मिला।
सच बताओ कौन हो तुम ऐ अमीरे नामदार॥20॥

बाप ने तो मेरे मुझ पर यह सितम बरपा किया।
हाथ काटा कैद की और सौ तअद्दी ओ ज़फ़ा।
मुझ से बेकस पर जो तुमने की यह कुछ लुत्फ़ो अता।
अब ख़ुदा के वास्ते जल्दी से ऐ बहरे सख़ा।
अपना कुछ नामो निशां मुझसे कहो तफ़सीलवार॥21॥

जब कहा हज़रत ने हम भी आदमी हैं ऐ अज़ीज़।
बन्दऐ दरगाहे रब्बुलआलमी हैं ऐ अज़ीज़।
ख़ाकसारो आजिज़ो अन्दोहगीं हैं ऐ अज़ीज़।
जिनका तू करता है मातम वह हमीं हैं ऐ अज़ीज़।
आफरीं सद आफ़रीं ऐ पाक मोमिन दीनदार॥22॥

यह हमारा है निशां ऐ पाक तीनत मुत्तक़ी।
नाम को पूछे तो हैगा नाम अब्बासे अली।
कर्बला के दश्त में दौलत शहादत की मिली।
जो हमें चाहे हमारा भी उसे चाहे है जी।
जो हमारा ग़म करे हम भी हैं उसके ग़मगुसार॥23॥

सुनते ही इस बात के एक बार वह लड़का ग़रीब।
हो गया शाद और वहीं सर रख के क़दमों के क़रीब।
यूं लगा कहने बड़ी क़िस्मत बड़े मेरे नसीब।
मैं कहां आज़िज़ कहां अल्लाह के ख़ासे हबीब।
मैं तसद्दुक हूं तुम्हारा या शहे वाला तबार॥24॥

यह करम यह लुत्फ़ यह बन्दा नवाजी किस से हो।
मुझ से नालायक की ऐसी सरफ़राज़ी किस से हो।
तुमने जो कुछ मुझ से की यह चारासाजी किस से हो।
यह हिमायत यह मदद या शाहे ग़ाज़ी किस से हो।
इस इनायत इस करम का है तुम्हीं पर कारोबार॥25॥

मैं जो अपने हाथ से करता था मातम बरमिला।
और उठाता था अलम भी मैं तुम्हारे बजा।
हक़ अगर पूछो तो किसका हाथ है कट कर मिला।
यह तुम्हीं से हो सका जो फिर दिया तन से लगा।
वर्ना किस में थी भला यह कु़दरत और यह इक़्तिदार॥26॥

वह अभी राग़िब था अपने दर्द के इज़हार का।
क्या दिया तन से मिला हाथ अपने मातमदार का।
मोज़िज़ा देखो यह इब्ने हैदर कर्रार का।
किस में यह कु़दरत बजुज़ फ़रज़ंद शेरे कर दिगार॥27॥

अब जो इसके हाथ पर कटने की आई थी गिरह।
कुछ हकीमों से न होता गर वह फिरता दह ब दह।
अब उन्होंने कर दिया एक आन में आते ही वह।
यह नहीं अब्बास का दस्ते यदुल्लाही है यह॥
जुज यदुल्लाह हो भला किस दस्त से यह दस्तकार॥28॥

क्या हुसैन इब्ने अली ने जस लिया मैदान में।
और हैं अब्बास अली की बख़्शिशें हर आन में।
जिनके बेटों के रहें दिल ख़ल्क़ के ऐहसान में।
क्यूं न फिर ख़ालिक कहे उनके पिदर की शान में।
ला फ़ता इल्ला अली ला सैफ़ इल्ला जुल्फ़्क़िार॥29॥

सुबह को उस कोठरी का खु़द बखु़द दर खुल गया।
बाप मां देखें तो उसका हाथ तन से है मिला।
पूछा यह क्या था, जो कुछ देखा था उसने सब कहा।
सुनते ही दोनों ने फिर तो सिदक से कल्मा पढ़ा।
हाथ में तस्बीह ली जुन्नार को डाला उतार॥30॥

फिर हुई उस मोजिजे़ की शहर की ख़ल्क़त में धूम-धूम।
हो गया उस तिफ़्ल पर सब शहर का आकर हुजूम।
देखता था जो कोई लेता था उसके हाथ चूम।
और लगा आंखों से यूं कहता था हर दम झूम-झूम।
यह उन्हीं की दोस्ती के गुल ने दिखलाई बहार॥31॥

अलग़रज मां बाप उस पर जानो दिल से हो फ़िदा।
लेके लड़के को चले दिल शाद सूए कर्बला।
राह में करते थे लोग उनकी ज़ियारत का बजा।
जब वह मंज़िल पर उतरते थे तो वां के लोग आ।
दम बदम करते थे अपना सीमो-ज़र उस पर निसार॥32॥

कू बकू शहरे नजफ़ में भी यह शोरो गुल पड़े।
एक मुहिब्बे पाक दिल आया है हिन्दुस्तान से।
वां के भी लोग आये सब इसकी ज़ियारत के लिये।
और लाखों शख़्स आये दूर और नज़दीक के।
इस क़दर यह मोजिज़ा सब में हुआ वां आशकार॥33॥

कर्बला के पास पहुंचा जिस घड़ी वह माहेताब।
उन शरीफ़ों को हुआ हुक्मे शहे आली जनाब।
एक हमारा दोस्त आता है चला जूं मौजे आब।
करके इस्तक़बाल तुम जाकर उसे लाओ शिताब।
उसकी लाज़िम है तुम्हें दिल दारी करनी बेशुमार॥34॥

कर्बला के लोग निकले उसके इस्तक़बाल को।
ले गये अस्पो शुतर आराइशो अजलाल को।
कर ज़ियारत चूम उसके दस्ते ख़ुश अफ़आल को।
सौ तजम्मुल से ग़रज उस साहिबे इक़बाल को।
शहर में लाये बसद इकराम और सद इफ़ित्ख़ार॥35॥

काम क्या क्या कुछ हुए उस से खु़दा की राह के।
फिर खु़दा ने भी उन्हें यह दस्त कु़दरत के दिये।
उसने कटवाया तो हाथ अब उनके मातम के लिये।
क्यूं न फिर तन से मिलाते वह तो मुंसिफ़ हैं बड़े।
सीख जावे उनसे नुसफ़त आके हर नुसफ़त शआर॥36॥

जब हुए रोजहे में दाखि़ल वह मुहिब्बाने अली।
कर ज़ियारत और तसद्दुक होके दिल से हर घड़ी।
वां उन्होंने कुछ मकां बनवाने की तज़वीज की।
लड़का बनवाता फिरे था हाथ में लेकर छड़ी।
की इमारत आखि़रश रंगीं मुनक़्क़श ज़र निगार॥37॥

दीनी भी उसको मिला दुनिया भी यारो देखियो।
और मुहिब्बे पाक कहलाया टुक इसको देखियो।
क्या मुहब्बत के चमन की है यह ख़ुशबू देखियो।
क्या ही तालेअ क्या ही किस्मत है मुहिब्बो देखियो।
उनकी उल्फ़त का निहाल आखिर यह लाया बर्गोबार॥38॥

या अली अब्बास ग़ाज़ी साहिबे ताजो सरीर।
सबके तुम मुश्किल कुशा हो क्या ग़रीबो क्या अमीर।
जानो दिल से अब तुम्हारे नाम का होकर फ़क़ीर।
यह गुलामे स्याहरू अब जिसको कहते हैं “नज़ीर”।
आपके फ़ज़्लो करम का यह भी है उम्मीदवार॥39॥

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