मोरी अरज सुनो-शामे-श्हरे-यारां -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

मोरी अरज सुनो-शामे-श्हरे-यारां -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

(नज़र-ए-ख़ुसरो)

“मोरी अरज सुनो दस्तगीर पीर”
“माई री कहूं, कासे मैं
अपने जिया की पीर”
“नैया बांधो रे
बांधो रे कनारे-दरिया”
“मोरे मन्दिर अब कयूं नहीं आये”

-इस सूरत से
अरज़ सुनाते
दर्द बताते
नैया खेते
मिन्नत करते
रसता तकते
कितनी सदियां बीत गई हैं
अब जाकर ये भेद खुला है
जिसको तुमने अरज़ गुज़ारी
जो था हाथ पकड़नेवाला
जिस जा लागी नाव तुमहारी
जिससे दुख का दारू मांगा
तोरे मन्दिर में जो नहं आया
वो तो तुम्हीं थे
वो तो तुम्हीं थे

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