मोती हूँ मैं-गीत-अगीत-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj 

मोती हूँ मैं-गीत-अगीत-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

मोती हूँ मैं,
किसी एक सीपी में बन्द
अंधे समुद्र के गर्भ में पड़ा हूँ,
तल के निकट
मगर तट से दूर ।

दिन बीते,
मास बीते,
वर्ष बीते,
मौसम आए गए;
लेकिन मैं वहीं हूँ
रख गई बी जहाँ मुझे
युगों पहले
नन्ही-सी लहर एक काल की।

असह अब अकेलापन,
खोल का सीमित व्यक्तित्व
व्यर्थ है दर्पनिका-कान्ति-
तन का वंचक कृतित्व !

जो मेरे उद्धारक !
पनडुब्बे-गोताखोर ।
इस जल-समाधि से बाहर निकाल मुझे;
ताकि मैं भी देख सकूँ-
तट पर यात्रियों के पद-चिह्न
जहाजों की क़तार,
आँधी-तूफान का खेल ।
और गुंथकर किसी माला में-
सुन सकूँ-
मृत लहरों की बजाय
हृदय का धड़कन संगीत
जीवन की आवाज़।

Leave a Reply