मै एक पथिक चलते-चलते-कविता -दीपक सिंह-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Deepak Singh

मै एक पथिक चलते-चलते-कविता -दीपक सिंह-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Deepak Singh

 

मै एक पथिक चलते-चलते,
मेरा सब्र टूट गया ।
तब मैं एक वृक्ष के साए में ।
जाके बैठ गया ।।

जब उसने देखी मेरी दशा,
पत्ते सब उसके हिलने लगे ।

तन में ठंडक होने लगी,
मन के तार सब बजने लगे ।।

जब सिर उसके तन पे टिकाया,
पत्ते गालों पर गिरने लगे ।

फिर याद आई तो मां की,
उसी पल ये मॉ से लगने लगे ।।

फिर मुझे नींद ऐसी आयी,
उस धरती मां पर लोट गया ।

मैं एक पथिक चलते चलते,
मेरा सब्र टूट गया ।
तब मैं एक वृक्ष के साए में,
जाके बैठ गया ।।

नींद खुली आगे चला,
देखा वृक्ष को काट रहे।

मैं समझाता मुझपर हंसते,
पागल हिस्से बाट रहे ।।

उस वृक्ष के गिरते ही,
पंछी उड़कर ताक रहे ।

जिसने छांव बसेरे फल दिये,
उसके सीने को नाप रहे।।

इंसा ने जब हद कर दी,
प्रकृतिचक्र तब डोल गया ।।

मैं एक पथिक चलते चलते,
मेरा सब्र टूट गया ।
तब मैं एक वृक्ष के साए में,
जाके बैठ गया।।

 

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