मैं भी तो-स्मृति सत्ता भविष्यत् -विष्णु दे -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vishnu Dey 

मैं भी तो-स्मृति सत्ता भविष्यत् -विष्णु दे -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vishnu Dey

 

मैं भी तो, सिर्फ आँखों से नहीं, पूरे मन-प्राण से
बादलों का भिखारी हूँ।
झुलसी हुई मिट्टी के हाहाकार से मेरे स्नायुओं में भी
मुमूर्षु अकाल भर जाता है,
मेरी चेतना में भी हजारों सपिल दरारें पड़ जाती है,
सूर्य के ईर्ष्या भरे आघात से मेरा आल-वाल भी चूर-चूर हो गया है।
मैं ने देखा है मनुष्य को टकटकी लगाये,
देखा है धरती लगातार फीके आसमान पर टकटकी लगाये रहती है।
क्योंकि जीवन में आज भी धरती और सहस्राक्ष आकाश प्रबल हैं।
मैं भी दिनरात जलधार को ताकता रहा हूँ !
तभी तो आज मैं दूर्वादलश्याम अभिराम वृष्टि सुन रहा हूँ,
वृष्टि देख रहा हूँ, बौछारों में गन्धों से घ्राण भर लेता हूँ,
मन ही मन मैं भी सत्ता का झुलसा खेत निराता हूँ, बोता है;
फ़सल की थरथराती बालो बन जाता हूँ।
मेरे स्नायुओं की गांठों में भी आज धरती का आषाढ़
वर्षा का उत्सव बन गया है;
हृदय बह उठा है, कगार टूट रहे हैं,
मुक्ताबिन्दु गूँथ-गूँथ कर लावण्य से चैतन्य भर लेता हूँ,
और उस के गले में पहना देता हूँ जिस के बाह मेरे गले में हैं।
शरीर का अन्धकार बादल भरा गीत बन जाता है,
सूर्योदय और सूर्यास्त की तीव्र छटा वन्दना ।
तभी तो आज अंकुर-अंकुर में ।
मेरी कविता भी प्रसन्न हवा में लहराती है
और आसन्न आश्विन में आहा ! धान की मंजरी ॥

७/२/५८

 

This Post Has One Comment

Leave a Reply