मैं पुरुष हूं……रोना, है निषिद्ध-प्राणेन्द्र नाथ मिश्र -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Pranendra Nath Misra

मैं पुरुष हूं……रोना, है निषिद्ध-प्राणेन्द्र नाथ मिश्र -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Pranendra Nath Misra

 

मैं पुरुष हूं, रोना है निषिद्ध
मैं अंतर्मन में, रोता हूं,
पुरुषत्व – प्रकृति, मर्यादित है
मैं अंतस्थल को भिगोता हूं।

मेरी कोख नहीं, माना मैने
संवेदना मगर, कोई कम तो नहीं!
शारीरिक बल, ईश्वर प्रदत्त
कोमल मन मेरा, विषम तो नहीं!

बचपन में मां ने सिखलाया
तुम पुरुष हो, कोई नारी तो नही!
ये आंसू, कायर लोगों के
दुख तुम्हे कोई, भारी तो नही!

हर बात पे मां यह कहती थी
बिन रोए दुख सहना सीखो,
पी जाओ आंसू की धारा
अंदर अंदर बहना सीखो।

मैं प्रकट नहीं कर पाता हूं
अपने संवेदन का उछाल,
मेरी बंधी हुई सीमाएं हैं
पर चेतनता, गहरी, विशाल।

संवेदन सीमा, अंतहीन
मेरा धैर्य है छूता अंतरिक्ष,
परिवार का हूं मैं मूल बीज
मेरी छाया, जैसे अटल वृक्ष।

मैं पिता, सृष्टि का प्रथम पुरुष
मेरा पुरुषत्व है, एक बिंदु,
इस संतति का कारण, मैं हूं
हे पृथा! ऊर्जा का मैं सिंधु।

मेरे कारण ही, मातृत्व तुम्हे
हे नारी!, मां कहलाती हो,
एक त्यागभरी,एक स्नेहमूर्ति
संतानों से बन पाती हो।

मेरे कारण, है यह वंश वृहत
पलता है कोख में अंश मेरा,
मैं नहीं, तो नारी मरुभूमि
संतानहीन, भूतों का डेरा।

मैं हूं कठोर, पर स्वार्थहीन
मैने त्यागे हैं सारे सुख,
अपना परिवार बचाने को
अपमान सहे और सहे हैं दुख।

कैसी विडंबना, हे ईश्वर!
संवेदक बना के छोड़ दिया,
बाहर आवाज नही आई
भीतर, पत्थर को तोड़ दिया।

हर पुरुष का हाल मेरे जैसा
पर्वत सा दुख, सह जाता है,
पर हृदय बरसता है उसका
और रो भी नही वह पाता है।

नारी दोषित करती है हमें
देते हैं दोष, पुरुष को पुरुष
सब सुख त्यागे, पर श्रीहीन
मैं हतभागा, श्रापित हूं नहुष।

 

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