मैं तो पढ़-लिख गई सहेली -जाने क्या टपके -अशोक चक्रधर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ashok Chakradhar ,

मैं तो पढ़-लिख गई सहेली -जाने क्या टपके -अशोक चक्रधर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ashok Chakradhar ,

(ग्रामीण बालाओं में साक्षरता के बाद ग़ज़ब का आत्मविश्वास आता है।)

मैं तो पढ़-लिख गई सहेली!
खेल न पाई बचपन में,
झिडक़ी तानों से खेली।
सदा सताया
निबल बताया,
कितनी आफत झेली।
समझ न पाए
नारी का मन,
बस कह दिया पहेली।
अब मेरे घर पढ़ें
जमीला, फूलो और चमेली।
मैं तो पढ़-लिख गई सहेली!
हमको कभी न
मानुस समझा,
समझा गुड़ की भेली।
चीज़ सजाने की माना,
दमका ली महल हवेली।
बचपन से ही बोझ कहा,
सारी आज़ादी ले ली।
हाथ की रेखा
बदलीं मैंने,
देखो जरा हथेली।
मैं तो पढ़-लिख गई सहेली!
दुनिया भर की ख़बरें बांचें,
समझें सभी पहेली।
अब न दबेंगी,
अब न सहेंगी,
समझो नहीं अकेली।
ओ भारत के नए ज़माने,
तेरी नारि नवेली।
पढ़-लिख कर अब
नई चेतना से
दमकी अलबेली।
मैं तो पढ़-लिख गई सहेली!

Leave a Reply